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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान ।
सुंदर तनुका बना भूषण । वह अतियोग्य ॥ १८-१७३८ ॥
या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति ।
या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ १८-१७३९ ॥
या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हो उसका ।
एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १८-१७४० ॥
मूल सहित जो है सजता । उसके विना भी जो है शोभा लाता ।
रचा मैने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ १८-१७४१ ॥
इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध ।
ब्रह्म-रसमें है सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ १८-१७४२ ॥

इसमें संदेह नहीं कि महाराष्ट्रमें भी आज ज्ञानेश्वरीकी मराठी भाषा सुबोध नहीं है । किंतु
जैसे इसी देश भाषामें लिखे गये अपने इस ग्रंथके परिणामके विषयमें वे तेरहवे अध्यायके
अंतमे कहते है.

इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान ।
श्रवणमात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ १३-११५८ ॥
वाग्विलास विस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर ।
बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ १३-११५९ ॥
मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान मनकी ।
खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ १३-११६० ॥
परतत्व देखें नयन । पाये सुख वसंत्तोद्यान ।
आकंठ ब्रह्मरसपान । करे विश्व ॥ १३-११६१ ॥

यह अबाल सुबोध प्रबंध है । अर्थात ज्ञानेश्वर महाराजके कालमें वह भाषा अबाल
सुबोध थी ।

श्रीमद्भगवद्गीतापर ज्ञानेश्वर महाराजको अत्यंत श्रद्धा है । वे भगवद्गीताको
" भारतकमल पराग " मानते हैं । गीता व्यासबुद्धीद्वारा शब्द ब्रह्माब्धिका मंथन करके निकाला
हुवा नवनीत है । वह भी ज्ञानाग्निसे तपा कर विवेक परिपक्व सुगंधित घी बना है । इससे
विरक्त उसकी अपेक्षा करते हैं, संत उसका अनुभव करते हैं, विद्वान उसमें रमते हैं; तथा
उसके सोऽहंभावमें सभी लीन होते हैं । ऐसी इस गीताको श्रीकृष्णने स्वयं कहा है । यह कोई
शब्दशास्त्र नहीं है किंतु संसारपर विजय पानेके लिये मानव मात्रको मिला हुवा एक महान
शस्त्र है ! इसमें विश्वको स्वानंद भोग प्राप्त कर देनेकी शक्ति है । गीता द्वापरके अंतमें युद्ध
भूमि पर श्रीकृष्णने मोहग्रस्त अर्जुनको कही थी; उससे भला सबको क्या लाभ ? तथा राजनै-
तिक दृष्टिसे अर्जुन एक महान व्यक्ति था। उसके सामने जो समस्या थी, वह सबके सामने
कहां है ? ऐसा एक प्रश्न उपस्थित हो सकता है । किंतु यहां पर अर्जुन मोहग्रस्त हुवा था ।
मोहका अर्थ अविवेक । अविवेक मानवकी एक भूमिका है। यहां छोटे बडेका सवाल नहीं
है । गीता अविवेक ग्रस्त मनुष्यके लिये उपदेश है । अर्जुन ऐसे अविवेक ग्रस्त समाज पुरुषका

५ —प्रस्तावना