ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1047, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व-दुर्गमें अटका गया ।
आत्मा-शंभुने वह छुडा लिया । तेरे स्मरणसे ॥ ज्ञा० १७-२ ॥
मयासुर शिल्पका आचार्य । ब्रह्माके वरसे इसने अजेय ऐसे तीन नगर बसा लिये ।
लोह-नगर, रजत-नगर, स्वर्ण-नगर । एकके ऊपर एक । एकके अंदर एक । इसको त्रिपुर कहा
करते थे । मयासुरके बाद उसके अनुयायियोंने इस अभेद्य नगरकी सहायतासे देवोंको खूब सताना
प्रारंभ किया । सभी देव तब शंकर भगवानके पास गये । शंकर भगवानकी प्रार्थना की । सब
देवोंको साथ लेकर शंकर भगवान त्रिपुर पर चढ़ाई कर गये । किंतु जाते समय सर्वप्रथम गणपति
पूजन नहीं किया था । इससे त्रिपुर-विजय नहीं हुआ । वहीं घिर गये । तब, सबने वहां गणपति
पूजन कर युद्धारंभ किया और शंकर भगवान त्रिपुरोंका संहार कर सके ।
ज्ञानेश्वर महाराजने गणपतिरूप गुरुवंदन करते समय यह कथा सुनाई है ।
प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य-शंभुने गला ।
तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ज्ञा० १८-७८९ ॥
समुद्र-मंथनमें प्रथम हलाहल विष आया वैसे ही जीवन-मंथनमें प्रथम वैराग्य आता है ।
वहां इस हलाहलको शंकरने गलेमें धारण कर लिया । यहां पर धैर्य ही वह शंकर है । धैर्यसे
वैराग्यके झटके सहने पड़ते हैं । इसके बाद जैसे वह अमृत कुंभ निकला वैसे यहां निर्मल
ज्ञानामृतका महान आनंद मिलता है । जीवनकी आध्यात्मिक साधनाको दर्शाते समय पौराणिक
कथाकी उपमा दी है ।
जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत ।
वैसे ईश्वरकी बात । चित्तमें रखना ॥ ज्ञा० १८-८३७ ॥
बच्चा पैदा होनेपर छठी रातको छठीकी पूजा करते हैं । विश्वेशस्य जन्मदानां जीवन्यपर-
नाम्न्याः षष्ठीदेव्याः शस्त्रागर्भाभगवत्याश्च पूजनं करिष्ये । यह पूजाका संकल्प होता है । इसके बाद
पटलेपर चावल, उसपे चार पूगीफल-सुपारी-रखकर जीवंति, षष्ठी, शस्त्रागर्भा भगवती ऐसी तीन
देवियोंकी प्रतिष्ठा करते हैं । एक हंसिया रेशमी कपड़ेमें लपेटकर सूपमें रखा जाता है । फिर-
गौरीपुत्रो यथा स्कंदः शिशुत्वे रक्षितः पुरा ।
तथा ममाप्ययं बालः षष्ठिके रक्षतां नमः ॥
ऐसी प्रार्थना की जाती है । और रात भर ज्योति जलती रखी जाती है । क्यों कि कहीं
अंधेरेमें छठी बालकका घात नहीं करे ।
अमरत्व परोसा पानमें । कारण हुआ था मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ज्ञा० १८-१४७८ ॥
समुद्रमंथनमेंसे जब अमृत निकला तब वह देव और दानव दोनोंके अधिकारका था । किंतु
दानवोंको अमृत देकर अमर करना लोक-क्षयकारी होगा इस विचारसे विष्णूने मोहिनीके रूपमें
अमृत-कलश लूटा । इसके बाद देव और दानव भोजनके लिये-अमृतपानके लिये-सामने सामने बैठे ।
मोहिनीके रूपमें विष्णु देवोंको अमृत परोसने लगा । उसी समय राहू नामका दैत्य धोखा देकर
देवोंकी पंगतमें बैठ गया । साथ साथ उसने अमृतपान भी किया किंतु अमृत गलेके नीचे उतरनेके
पहले ही सूर्य और चंद्रने उसको पहचान लिया और विष्णुने सुदर्शनसे उसका शिरच्छेद किया ।
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