देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| ८८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| स्वमायां संहरत्येव स्वानुभूतिप्रदानतः।<br>भुवनं खलु माया स्यादीश्वरी तस्य नायिका॥ ५१<br><br>भुवनेशी ततः प्रोक्ता देवी त्रैलोक्यसुन्दरी।<br>तद्रूपे यदि सक्तं स्याच्चित्तं भूमिपते सदा॥ ५२<br><br>मायया किं भवेत्तत्र सदसद्भूतया नृप।<br>तस्मान्मायानिरासार्थं नान्यद्वै देवतान्तरम्॥ ५३<br><br>समर्थं तु विना देवीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्। | मायाको हर लेती हैं। समस्त भुवन मायारूप है तथा वे ईश्वरी उसकी नायिका हैं। इसीलिये त्रैलोक्यसुन्दरी भगवतीको 'भुवनेशी' कहा गया है। हे पृथ्वीपते! यदि उन भगवतीके रूपमें चित्त सदा आसक्त हो जाय तो सत्-असत्स्वरूपा माया अपना क्या प्रभाव डाल सकती है? अतः हे राजन्! सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती परमेश्वरीको छोड़कर अन्य कोई भी देवता उस मायाको दूर करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४९-५३ १/२॥ |
| तमोराशिं नाशयितुं शक्तं नैव तमो भवेत्॥ ५४<br><br>किन्तु भानुप्रभाचन्द्रविद्युद्वह्निप्रभादयः।<br>तस्मान्मायेश्वरीमम्बां स्वप्रकाशां तु संविदम्॥ ५५<br><br>आराधयेदतिप्रीत्या मायागुणनिवृत्तये। | एक अन्धकार किसी दूसरे अन्धकारको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; किंतु सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् तथा अग्नि आदिकी प्रभा उस अन्धकारको मिटा देती है। अतएव मायाके गुणोंसे निवृत्ति प्राप्त करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक स्वयंप्रकाशित तथा ज्ञानस्वरूपिणी भगवती मायेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये॥ ५४-५५ १/२॥ |
| इति सम्यङ्मयाख्यातं वृत्रासुरवधादिकम्॥ ५६<br><br>यत्पृष्टं राजशार्दूल किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि। | हे राजेन्द्र! वृत्रासुर-वध आदिकी कथाके विषयमें आपने जो पूछा था, उसका वर्णन मैंने भलीभाँति कर दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ५६ १/२॥ |
| पूर्वार्धोऽयं पुराणस्य कथितस्तव सुव्रत॥ ५७<br><br>यत्र देव्यास्तु महिमा विस्तरेणोपपादितः।<br>एतद्रहस्यं श्रीमातुर्न देयं यस्य कस्यचित्॥ ५८<br><br>देयं भक्ताय शान्ताय देवीभक्तिरताय च।<br>शिष्याय ज्येष्ठपुत्राय गुरुभक्तियुताय च॥ ५९ | हे सुव्रत! श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पूर्वार्ध मैंने आपसे कहा, जिसमें देवीकी महिमाका विस्तार-पूर्वक वर्णन किया गया है। भगवती जगदम्बाका यह रहस्य जिस किसीको नहीं सुना देना चाहिये। भक्त, शान्त, देवीकी भक्तिमें लीन, ज्येष्ठ पुत्र तथा गुरुभक्तिसे युक्त शिष्यके समक्ष ही इसका वर्णन करना चाहिये॥ ५७-५९॥ |
| इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं<br>निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम्।<br>पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या<br>स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र॥ ६० | इस संसारमें जो मनुष्य सम्पूर्ण कथाओंके सार-स्वरूप, समस्त वेदोंकी तुलना करनेवाले तथा नानाविध प्रमाणोंसे परिपूर्ण इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विशेष श्रद्धाके साथ भक्तिपूर्वक पाठ करता है तथा इसका श्रवण करता है, वह ऐश्वर्यसम्पन्न तथा ज्ञानवान् हो जाता है॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे भगवतीमाहात्म्यवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
॥ षष्ठः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण पूर्वार्ध सम्पूर्णम् ॥