देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 888 of 889
Read in contextPage 888
अ० ३१] षष्ठ स्कन्ध ८७९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्मा कदाचित्सत्त्वस्थस्तदा शान्तः समाधिमान्।<br>प्रीतियुक्तो भवेत्सर्वभूतेषु ज्ञानसंयुतः ॥ ३८<br><br>पुनः सत्त्वविहीनस्तु रजोगुणसमावृतः।<br>तदा भवेद् घोररूपः सर्वत्राप्रीतिसंयुतः ॥ ३९<br><br>यदा तमोगुणाविष्टो बाहुल्येन भवेद्विधिः।<br>तदा विषादसम्पन्नो मूढो भवति नान्यथा ॥ ४० | जब ब्रह्मा सत्त्वगुणमें स्थित रहते हैं तब वे शान्त, समाधिस्थ, ज्ञानसम्पन्न तथा सभी प्राणियोंके प्रति प्रेमसे युक्त हो जाते हैं। वे ही जब सत्त्वगुणसे विहीन होकर रजोगुणकी अधिकतासे युक्त होते हैं, तब उनका रूप भयावह हो जाता है और वे सबके प्रति अप्रीतिकी भावनासे युक्त हो जाते हैं। वे ही ब्रह्मा जब तमोगुणकी अधिकतासे आविष्ट हो जाते हैं, तब वे विषादग्रस्त तथा मूढ़ हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ३८-४० ॥ |
| माधवोऽपि सदा सत्त्वसंश्रितः सर्वथा भवेत्।<br>यदा शान्तः प्रीतियुक्तो भवेज्ज्ञानसमन्वितः ॥ ४१<br><br>स एव रजआधिक्यादप्रीतिसंयुतो भवेत्।<br>घोरश्च सर्वभूतेषु गुणाधीनो रमापतिः ॥ ४२ | सदा सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले विष्णु इसी गुणके कारण शान्त, प्रीतिमान् तथा ज्ञानसम्पन्न रहते हैं। वे ही रमापति विष्णु रजोगुणकी अधिकताके कारण अप्रीतिसे युक्त हो जाते हैं और तमोगुणके अधीन होकर सभी प्राणियोंके लिये घोररूप हो जाते हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
| रुद्रोऽपि सत्त्वसंयुक्तः प्रीतिमाञ्छान्तिमान्भवेत्।<br>रजोनिमीलितः सोऽपि घोरः प्रीतिविवर्जितः ॥ ४३<br><br>तमोगुणयुतः सोऽपि मूढो विषादयुग्भवेत्।<br>एते यदि गुणाधीना ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ ४४ | इसी प्रकार रुद्र भी सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर प्रेम तथा शान्तिसे समन्वित रहते हैं, किंतु रजोगुणसे आविष्ट होनेपर वे भी भयानक तथा प्रेमविहीन हो जाते हैं। इसी तरह तमोगुणसे आविष्ट होनेपर वे रुद्र मूढ़ तथा विषादग्रस्त हो जाते हैं ॥ ४३ १/२ ॥ |
| सूर्यवंशोद्भवास्तद्वत्सोमवंशभवा अपि।<br>मन्वादयश्च ये प्रोक्ताश्चतुर्दश युगे युगे ॥ ४५<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम।<br>मायाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ४६ | हे नृपश्रेष्ठ! यदि ये ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तथा युग-युगमें जो सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी चौदहों मनु कहे गये हैं—वे भी गुणोंके अधीन रहते हैं, तब इस संसारमें अन्य लोगोंकी कौन-सी बात ? देवता, दानव तथा मानवसमेत यह सम्पूर्ण जगत् मायाका वशवर्ती है ॥ ४४-४६ ॥ |
| तस्माद् राजन्न कर्तव्यः सन्देहोऽत्र कदाचन।<br>देही मायापराधीनश्चेष्टते तद्वशानुगः ॥ ४७ | अतएव हे राजन्! इस विषयमें कदापि सन्देह नहीं करना चाहिये। प्राणी मायाके अधीन है और वह उसीके वशवर्ती होकर चेष्टा करता है ॥ ४७ ॥ |
| सा च माया परे तत्त्वे संविद्रूपेऽपि सर्वदा।<br>तदधीना प्रेरिता च तेन जीवेषु सर्वदा ॥ ४८ | वह माया भी सदा संविद्रूप परमतत्त्वमें स्थित रहती है। वह उसीके अधीन रहती हुई उसीसे प्रेरित होकर जीवोंमें सदा मोहका संचार करती है ॥ ४८ ॥ |
| ततो मायाविशिष्टां तां संविदं परमेश्वरीम्।<br>मायेश्वरीं भगवतीं सच्चिदानन्दरूपिणीम् ॥ ४९<br><br>ध्यायेत्तथाराधयेच्च प्रणमेच्च जपेदपि।<br>तेन सा सदया भूत्वा मोचयत्येव देहिनम् ॥ ५० | अतः विशिष्टमायास्वरूपा, प्रज्ञामयी, परमेश्वरी, मायाकी अधिष्ठात्री, सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती जगदम्बाका ध्यान, पूजन, वन्दन तथा जप करना चाहिये। उससे वे भगवती प्राणीपर दया करके उसे मुक्त कर देती हैं और अपनी अनुभूति कराकर अपनी |