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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 881 of 889

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Page 881

८७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३०

संस्कृत श्लोकहिन्दी अर्थ
न युक्तमधुना यन्मां विहाय त्रिदिवं गता।<br>विलपन्तं पतिं दीनं पुत्रस्नेहेन यन्त्रिता॥ ८यह तुम्हारे लिये उचित नहीं है जो कि दीन-दशाको प्राप्त मुझ पतिको इस प्रकार विलाप करता हुआ छोड़कर पुत्र-स्नेहरूपी पाशमें बँधी हुई तुम स्वर्ग चली गयी॥ ८॥
उभयं मे गतं कान्ते पुत्रास्त्वं प्राणवल्लभा।<br>तथापि मरणं नास्ति दुःखितस्य भृशं प्रिये॥ ९हे कान्ते! हे प्रिये! मेरे पुत्र तथा प्राणप्रिय तुम—ये दोनों ही चले गये फिर भी मुझ अत्यन्त दुःखितका मरण नहीं हो रहा है॥ ९॥
किं करोमि क्व गच्छामि रामो नास्ति महीतले।<br>रामाविरहजं दुःखं जानाति रघुनन्दनः॥ १०मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? इस समय पृथ्वीपर राम भी नहीं हैं; क्योंकि पत्नीवियोगजन्य दुःखको एकमात्र वे रघुनन्दन राम ही जानते हैं॥ १०॥
विधिना निष्ठुरेणात्र विपरीतं कृतं भुवि।<br>दम्पत्योर्मरणं भिन्नं सर्वथा समचित्तयोः॥ ११इस जगत्में निष्ठुर ब्रह्माने यह बहुत विपरीत कार्य किया है, जो कि वे समान चित्तवाले पति-पत्नीका मरण भिन्न-भिन्न समयोंमें किया करते हैं॥ ११॥
उपकारस्तु नारीणां मुनिभिर्विहितः किल।<br>यदुक्तं धर्मशास्त्रेषु ज्वलनं पतिना सह॥ १२मुनियोंने नारियोंका अवश्य ही बड़ा उपकार कर दिया है, जो उन्होंने धर्मशास्त्रोंमें पतिके साथ पत्नीके भी जल जाने (सती होने)-का उल्लेख किया है॥ १२॥
एवं विलपमानं तं राजानं भगवान्हरिः।<br>निवारयामास तदा वचनैर्युक्तियोजितैः॥ १३इस प्रकार विलाप कर रहे उन तालध्वजको भगवान् विष्णुने अनेक प्रकारके युक्तिपूर्ण वचनोंसे सान्त्वना दी॥ १३॥
श्रीभगवानुवाच<br>किं विषीदसि राजेन्द्र क्व गता ते प्रियाङ्गना।<br>न श्रुतं किं त्वया शास्त्रं न कृतोऽसौ बुधाश्रयः॥ १४श्रीभगवान् बोले—हे राजेन्द्र! क्यों रो रहे हो? तुम्हारी प्रिय भार्या कहाँ चली गयी? क्या तुमने कभी शास्त्रश्रवण नहीं किया है अथवा विद्वज्जनोंकी संगति नहीं की है?
का सा कस्त्वं क्व संयोगो वियोगः कीदृशस्तव।<br>प्रवाहरूपे संसारे नृणां नौतरतामिव॥ १५वह तुम्हारी कौन थी? तुम कौन हो? कैसा संयोग तथा कैसा वियोग? प्रवहमान इस संसारसागरमें मनुष्योंका सम्बन्ध नौकापर चढ़े हुए मनुष्योंकी भाँति है।
गृहे गच्छ नृपश्रेष्ठ वृथा ते रुदितेन किम्।<br>संयोगश्च वियोगश्च दैवाधीनः सदा नृणाम्॥ १६हे नृपश्रेष्ठ! अब तुम घर जाओ। तुम्हारे व्यर्थ रोनेसे क्या लाभ? मनुष्योंका संयोग तथा वियोग सदा दैवके अधीन रहता है।
अनया सह ते राजन् संयोगस्त्विह संवृतः।<br>भुक्ता त्वया विशालाक्षी सुन्दरी तनुमध्यमा॥ १७हे राजन्! विशाल नयनोंवाली इस कृशोदरी सुन्दर स्त्रीके साथ जो भोग करना था, उसे आपने कर लिया। अब इसके साथ आपके संयोगका समय समाप्त हो चुका है।
न दृष्टौ पितरावस्यास्त्वया प्राप्ता सरोवरे।<br>काकतालीप्रसङ्गेन यद्भूतं तत्तथा गतम्॥ १८एक सरोवरपर इसके साथ आपका संयोग हुआ था; उस समय इसके माता-पिता आपको दिखायी नहीं पड़े थे। यह अवसर काकतालीय न्यायके अनुसार जैसे आया था, वैसे ही चला गया॥ १८॥