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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 880 of 889

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Page 880

अ० ३० ] षष्ठ स्कन्ध ८७१

| सञ्चिन्तितं मया तत्र नारदोऽहमिहागतः।<br>हरिणा सह स्त्रीभावं प्राप्तो मायाविमोहितः॥ ६४ | मैं सोचने लगा कि मैं नारद हूँ और भगवान् विष्णुके साथ यहाँ आया था; मायासे विमोहित होनेके कारण मैं स्त्रीभावको प्राप्त हो गया॥ ६४॥ |
| इति चिन्तापरश्चाहं यदा जातस्तदा हरिः।<br>मामाह नारदागच्छ किं करोषि जले स्थितः॥ ६५ | जब मैं इस तरहकी बातें सोच रहा था, उसी समय भगवान् विष्णुने मुझसे कहा—हे नारद! यहाँ आओ, वहाँ जलमें खड़े होकर क्या कर रहे हो ? ॥ ६५॥ |
| विस्मितोऽहं तदा स्मृत्वा स्त्रीभावं दारुणं भृशम्।<br>पुनः पुरुषभावश्च सम्पन्नः केन हेतुना॥ ६६ | अपने अत्यन्त दारुण स्त्रीभावका स्मरण करके तथा किस कारणसे मैं पुनः पुरुषभावको प्राप्त हुआ— यह सोचकर मैं आश्चर्यचकित हो गया॥ ६६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य पुनः स्वरूपप्राप्तिवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥


अथ त्रिंशोऽध्यायः

राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मणवेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना

नारद उवाचनारदजी बोले—
मां दृष्ट्वा नारदं विप्रं विस्मितोऽसौ महीपतिः।<br>क्व गता मम भार्या सा कुतोऽयं मुनिसत्तमः॥ १मुझ विप्ररूप नारदको देखकर वे राजा तालध्वज इस आश्चर्यमें पड़ गये कि मेरी वह पत्नी कहाँ चली गयी और ये मुनिश्रेष्ठ कहाँसे आ गये? ॥ १॥
विललाप नृपस्तत्र हा प्रियेति मुहुर्मुहुः।<br>क्व गता मां परित्यज्य विलपन्तं वियोगिनम्॥ २राजा तालध्वज बार-बार यह कहकर विलाप करने लगे—‘हा प्रिये! मुझ वियोगीको विलाप करता हुआ छोड़कर तुम कहाँ चली गयी?’॥ २॥
विना त्वां विपुलश्रोणि वृथा मे जीवितं गृहम्।<br>राज्यं कमलपत्राक्षि किं करोमि शुचिस्मिते॥ ३हे विपुलश्रोणि! हे कमलसदृश नेत्रवाली! हे पवित्र मुसकानवाली! तुम्हारे विना मेरा जीवन, घर तथा राज्य—ये सभी व्यर्थ हैं। अब मैं क्या करूँ? ॥ ३॥
न प्राणा मे बहिर्यान्ति विरहेण तवाधुना।<br>गतो वै प्रीतिधर्मस्तु त्वामृते प्राणधारणात्॥ ४तुम्हारे वियोगमें इस समय मेरे प्राण भी नहीं निकल रहे हैं। तुम्हारे विना प्राण धारण करनेसे प्रेम-धर्म भी सर्वथा विनष्ट हो गया॥ ४॥
विलपामि विशालाक्षि देहि प्रत्युत्तरं प्रियम्।<br>क्व गता सा मयि प्रीतिर्याभूत्प्रथमसङ्गमे॥ ५हे विशाल नयनोंवाली! मैं विलाप कर रहा हूँ; तुम मुझे प्रिय उत्तर प्रदान करो। प्रथम-मिलनमें मेरे प्रति जो प्रीति थी, वह कहाँ चली गयी?॥ ५॥
निमग्ना किं जले सुभ्रूर्भक्षिता मत्स्यकच्छपैः।<br>गृहीता वरुणेनाशु मम दौर्भाग्ययोगतः॥ ६हे सुभ्रु! क्या तुम जलमें डूब गयी? अथवा मछली या कछुए तुम्हें खा गये? या फिर मेरे दुर्भाग्यवश वरुणने तुम्हें शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया? ॥ ६॥
धन्या सुचारुसर्वाङ्गि या त्वं पुत्रैः समागता।<br>अकृत्रिमस्तु पुत्रेषु स्नेहस्तेऽमृतभाषिणि॥ ७हे सर्वाङ्गसुन्दरि! हे अमृतभाषिणि! तुम धन्य हो, जो अपने पुत्रोंके साथ चली गयी; उन पुत्रोंके प्रति तुम्हारा वास्तविक प्रेम था॥ ७॥