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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 821 of 889

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Page 821
८१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८

| शिव उवाच<br>कथं ज्ञातस्त्वया देवि मम तस्य च सुन्दरि।<br>ऐक्यभावो हरेर्नूनं सत्यं मे वद सिन्धुजे॥ ३३<br>एकत्वं च न जानन्ति देवाश्च मुनयस्तथा।<br>ज्ञानिनो वेदतत्त्वज्ञाः कुतर्कोपहताः किल॥ ३४<br>मद्भक्ता वासुदेवस्य निन्दका बहवस्तथा।<br>विष्णुभक्तास्तु बहवो मम निन्दापरायणाः॥ ३५<br>भवन्ति कालभेदेन कलौ देवि विशेषतः।<br>कथं ज्ञातस्त्वया भद्रे दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः॥ ३६<br>सर्वथा त्वैक्यभावस्तु हरेर्मम च दुर्लभः। | शिव बोले— हे देवि! हे सुन्दरि! मेरे तथा उन विष्णुके एकत्वका ज्ञान तुम्हें किस प्रकार हुआ? हे सिन्धुजे! मुझे सच-सच बताओ॥ ३३॥<br>देवता, मुनि, ज्ञानी तथा वेदोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् भी तरह-तरहके कुतर्कोंसे ग्रस्त पड़े रहनेके कारण इस ऐक्यभावको नहीं जानते॥ ३४॥<br>मेरे बहुत-से भक्त वासुदेव श्रीविष्णुके निन्दक हैं तथा श्रीविष्णुके बहुत-से भक्त मेरी निन्दामें लगे रहते हैं। हे देवि! कालभेदके कारण कलियुगमें ऐसे लोग विशेषरूपसे होंगे। हे भद्रे! दूषित आत्मावाले लोगोंद्वारा दुर्ज्ञेय इस एकत्वको आप कैसे जान गयीं? मेरे तथा श्रीविष्णुका ऐक्यभाव जान पाना सर्वथा दुर्लभ है॥ ३५-३६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सा शम्भुना पृष्टा तुष्टेन हरिवल्लभा॥ ३७<br>वृत्तान्तं तस्य विज्ञातं प्रवक्तुमुपचक्रमे।<br>शिवं प्रति रमा तत्र प्रसन्नवदना भृशम्॥ ३८ | व्यासजी बोले— प्रसन्न हुए भगवान् शंकरके इस प्रकार पूछनेपर अत्यन्त प्रसन्नमुखवाली हरिप्रिया लक्ष्मीजीने [उस एकत्वसे सम्बन्धित] ज्ञात प्रसंगको शिवजीसे कहना प्रारम्भ किया॥ ३७-३८॥ |
| लक्ष्मीरुवाच<br>एकदा देवदेवेश विष्णुर्ध्यानपरो रहः।<br>दृष्टो मया तपः कुर्वन्पद्मासनगतो यदा॥ ३९<br>तदाहं विस्मिता देवं तमपृच्छं पतिं किल।<br>प्रबुद्धं सुप्रसन्नं च ज्ञात्वा विनयपूर्वकम्॥ ४०<br>देवदेव जगन्नाथ यदाहं निर्गतार्णवात्।<br>मथ्यमानात्सुरैर्दैत्यैः सर्वैर्ब्रह्मादिभिः प्रभो॥ ४१<br>वीक्षिताश्च मया सर्वे पतिकामनया तदा।<br>वृतस्त्वं सर्वदेवेभ्यः श्रेष्ठोऽसीति विनिश्चयात्॥ ४२<br>त्वं कं ध्यायसि सर्वेश संशयोऽयं महान्मम।<br>प्रियोऽसि कैटभारे मे कथयस्व मनोगतम्॥ ४३ | लक्ष्मीजी बोलीं— हे देवदेवेश! एक बार भगवान् विष्णुको एकान्तमें पद्मासन लगाकर ध्यानस्थ हो तपस्या करते हुए जब मैंने देखा तब मुझे महान् विस्मय हुआ; और पुनः समाधिसे जगनेपर उन्हें अति प्रसन्न जानकर मैंने पतिदेवसे विनयपूर्वक पूछा—॥ ३९-४०॥<br>हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे प्रभो! जिस समय ब्रह्मा आदि सभी देवताओं तथा दैत्योंके द्वारा मथे जा रहे समुद्रसे मैं निकली, उस समय पतिकी इच्छासे मैंने सभीकी ओर देखा, सभी देवताओंकी अपेक्षा आप ही श्रेष्ठ हैं—ऐसा निश्चय करके मैंने आपका ही वरण किया था। अतः हे सर्वेश! आप किसका ध्यान कर रहे हैं? मुझे यह महान् सन्देह है। हे कैटभारे! आप मेरे प्रिय हैं। अतः अपने मनकी बात मुझे बतायें॥ ४१—४३॥ |
| विष्णुरुवाच<br>शृणु कान्ते प्रवक्ष्यामि यं ध्यायामि सुरोत्तमम्।<br>आशुतोषं महेशानं गिरिजावल्लभं हृदि॥ ४४<br>कदाचिद्देवदेवो मां ध्यायत्यमितविक्रमः।<br>ध्यायाम्यहं च देवेशं शङ्करं त्रिपुरान्तकम्॥ ४५<br>शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम।<br>उभयोरन्तरं नास्ति मिथः संसक्तचेतसोः॥ ४६ | विष्णु बोले— हे प्रिये! मैं जिन सुरश्रेष्ठ, आशुतोष, महेश्वर तथा पार्वतीपति शंकरका ध्यान [अपने] हृदयमें कर रहा हूँ, उनके विषयमें बताऊँगा; सुनो॥ ४४॥<br>असीम पराक्रमसम्पन्न देवाधिदेव भगवान् शंकर कभी मेरा ध्यान करते हैं और कभी मैं त्रिपुरासुरके संहारक देवेश शंकरका ध्यान करने लगता हूँ॥ ४५॥<br>शिवका प्रिय प्राण मैं हूँ तथा मेरे प्रिय प्राण वे हैं। इस प्रकार परस्पर अनुरक्त चित्तवाले हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है॥ ४६॥ |