देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 820 of 889
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अ० १८] षष्ठ स्कन्ध ८११
| हरिं त्यक्त्वाद्य मां कस्मात्स्तौषि देवि जगत्पतिम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥ २१ | हे देवि! भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले जगत्पति वासुदेव जगन्नाथ विष्णुको छोड़कर इस समय आप मेरी आराधना किसलिये कर रही हैं?॥ २१॥ |
| वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पतिः।<br>नान्यस्मिन्सर्वथा भावः कर्तव्यः कर्हिचित्क्वचित्॥ २२ | स्त्रियोंके लिये पति ही उनका देवता होता है—इस वेदोक्त वचनका उन्हें पालन करना चाहिये। किसी दूसरेमें कभी कहीं भी भावना नहीं करनी चाहिये॥ २२॥ |
| पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातनः।<br>यादृशस्तादृशः सेव्यः सर्वथा शुभकाम्यया॥ २३ | पतिकी सेवा-शुश्रूषा ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है। पति चाहे जैसा भी हो, कल्याणकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको निरन्तर उसकी सेवा करनी चाहिये॥ २३॥ |
| नारायणस्तु सर्वेषां सेव्यो योग्यः सदैव हि।<br>तं त्यक्त्वा देवदेवेशं किं मां ध्यायसि सिन्धुजे॥ २४ | भगवान् विष्णु तो सर्वदा सभी प्राणियोंकी आराधनाके योग्य हैं। अतएव हे सिन्धुजे! उन देवाधिदेवको छोड़कर आप मेरा ध्यान क्यों कर रही हैं?॥ २४॥ |
| लक्ष्मीरुवाच<br>आशुतोष महेशान शप्ताहं पतिना शिव।<br>मां समुद्धर देवेश शापादस्माद्दयानिधे॥ २५ | लक्ष्मी बोलीं—हे आशुतोष! हे महेशान! हे शिव! हे देवेश! हे दयानिधान! मेरे पतिने मुझे शाप दे दिया है; अतएव इस शापसे आप मेरा उद्धार कीजिये॥ २५॥ |
| तदोक्तं हरिणा शम्भो शापानुग्रहकारणम्।<br>विज्ञप्तेन मया कामं दयायुक्तेन विष्णुना॥ २६<br><br>यदा ते भविता पुत्रस्तदा शापस्य मोक्षणम्।<br>भविष्यति च वैकुण्ठवासस्ते कमलालये॥ २७ | हे शम्भो! उस समय मेरे बहुत पूछनेपर दयालु भगवान् विष्णुने शापसे मुक्तिका यह उपाय भी बतला दिया था—'हे कमलालये! जब तुम्हें एक पुत्र उत्पन्न हो जायगा तब तुम शापसे मुक्त हो जाओगी और वैकुण्ठधाममें पुनः तुम्हारा वास होगा'॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ताहं तपस्तप्तुमागतास्मि तपोवने।<br>आराधितो मया देव त्वं सर्वार्थप्रदायकः॥ २८ | हे देव! श्रीविष्णुके इस प्रकार कहनेपर मैं तपस्या करनेके लिये इस तपोवनमें आ गयी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आप परमेश्वरकी आराधना करने लगी॥ २८॥ |
| पतिसङ्गं विना पुत्रं देवदेव लभे कथम्।<br>स तु तिष्ठति वैकुण्ठे त्यक्त्वा वामामनागसम्॥ २९ | हे देवदेव! मुझ निरपराध पत्नीको छोड़कर वे विष्णु तो वैकुण्ठमें विराजमान हैं; अतएव पतिके सांनिध्यके बिना मैं पुत्र कैसे प्राप्त कर सकती हूँ?॥ २९॥ |
| वरं मे देहि देवेश यदि तुष्टोऽसि शङ्कर।<br>तव तस्य द्विधा भावो नास्ति नूनं कदाचन॥ ३० | हे देवेश! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये। आप तथा श्रीहरिमें निश्चितरूपसे कोई भेद नहीं है॥ ३०॥ |
| मयैतद् गिरिजाकान्त ज्ञातं पत्युः पुरो हर।<br>यस्त्वं योऽसौ पुनर्योऽसौ स त्वं नास्त्यत्र संशयः॥ ३१ | हे गिरिजाकान्त! हे हर! जब मैं पतिदेवके पास थी तभीसे मुझे यह ज्ञात है कि जो आप हैं, वही वे हैं तथा जो वे हैं, वही आप हैं; इसमें संशय नहीं है॥ ३१॥ |
| एकत्वं च मया ज्ञात्वा मया ते स्मरणं कृतम्।<br>अन्यथा मम दोषस्त्वामाश्रयन्त्या भवेच्छिव॥ ३२ | [आप तथा श्रीविष्णुमें] एकत्व जानकर ही मैंने आपका स्मरण किया है, अन्यथा हे शिव! आपका आश्रय लेनेसे मुझे दोष ही लगता॥ ३२॥ |