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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 479 of 889

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Page 479
४७०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४
अद्य मन्दबला यूयं कालयोगादसंशयम्।<br>देवैर्जिताः सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ ४३इसमें संदेह नहीं कि तुमलोग आज समयके फेरसे क्षीण बलवाले हो गये हो, अतः एक बार देवताओंसे पराजित होकर तुमलोगोंको पातालमें जाना ही पड़ेगा॥ ४३॥
प्राप्तः पर्यायकालो व इति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>भुक्तं राज्यं भवद्भिश्च पूर्णं सर्वं समृद्धिमत्॥ ४४<br><br>युगानि दश पूर्णानि देवानावक्रम्य मूर्धनि।<br>दैवयोगाच्च युष्माभिर्भुक्तं त्रैलोक्यमूर्जितम्॥ ४५अब तुमलोगोंका समय-परिवर्तन उपस्थित हुआ है, ऐसा ब्रह्माजीने कहा था। कुछ दिनों पूर्व तुमलोगोंने सब प्रकारसे समृद्ध राज्यसुखका भोग किया था। उस समय देवताओंपर आक्रमण करके उनके मस्तकपर चरण रखकर तुमलोगोंने दैवयोगसे पूरे दस युगोंतक इस दिव्य त्रिलोकीपर शासन किया था॥ ४४-४५॥
सावर्णिके मनौ राज्यं पुनस्तत्तु भविष्यति।<br>पौत्रस्त्रैलोक्यविजयी राज्यं प्राप्स्यति ते बलिः॥ ४६[अब आगे आनेवाले] सावर्णि मन्वन्तरमें तुम्हें वह राज्य पुनः प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र बलि तीनों लोकोंमें विजयी होकर राज्यको पुनः प्राप्त कर लेगा॥ ४६॥
यदा वामनरूपेण हृतं देवेन विष्णुना।<br>तदैव च भवत्पौत्रः प्रोक्तो देवेन जिष्णुना॥ ४७<br><br>हृतं येन बले राज्यं देववाञ्छार्थसिद्धये।<br>त्वमिन्द्रो भविता चाग्रे स्थिते सावर्णिके मनौ॥ ४८जिस समय वामनरूप धारण करके भगवान् विष्णुने [राजा बलिका राज्य] छीन लिया था, उस समय भगवान् विष्णुने आपके पौत्र बलिसे कहा था—हे बले! मैंने तुम्हारा यह राज्य देवताओंकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये छीना है, किंतु आगे सावर्णि मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर तुम इन्द्र होओगे॥ ४७-४८॥
भार्गव उवाच<br>इत्युक्तो हरिणा पौत्रस्तव प्रह्लाद साम्प्रतम्।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां गुप्तश्चरति भीतवत्॥ ४९शुक्राचार्य बोले—हे प्रह्लाद! भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहा गया तुम्हारा पौत्र बलि इस समय सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहकर डरे हुएकी भाँति गुप्तरूपसे विचरण कर रहा है॥ ४९॥
एकदा वासवेनासौ बलिर्गर्दभरूपभाक्।<br>शून्ये गृहे स्थितः कामं भयभीतः शतक्रतोः॥ ५०<br><br>पृष्टश्च बहुधा तेन वासवेन बलिस्तदा।<br>किमर्थं गार्दभं रूपं कृतवान्दैत्यपुङ्गव॥ ५१<br><br>भोक्ता त्वं सर्वलोकस्य दैत्यानां च प्रशासिता।<br>(न लज्जा खररूपेण तव राक्षससत्तम।)<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैत्यराजो बलिस्तदा॥ ५२एक समयकी बात है—इन्द्रसे भयभीत बलि गर्दभका रूप धारण करके एक सूने घरमें स्थित थे, तभी [वहाँ पहुँचकर] इन्द्र उन बलिसे बार-बार पूछने लगे—हे दैत्यश्रेष्ठ! आपने गर्दभका रूप क्यों धारण किया है? आप तो समस्त लोकोंका भोग करनेवाले और दैत्योंके शासक हैं। (हे राक्षसश्रेष्ठ! क्या गर्दभका रूप धारण करनेमें आपको लज्जा नहीं लगती?) ॥ ५०-५१ १/२॥
प्रोवाच वचनं शक्रं कोऽत्र शोकः शतक्रतो।<br>यथा विष्णुर्महातेजा मत्स्यकच्छपतां गतः॥ ५३तब इन्द्रकी वह बात सुनकर बलिने इन्द्रसे यह वचन कहा—हे शतक्रतो! इसमें शोक कैसा? जैसे महान् तेजस्वी भगवान् विष्णुने मत्स्य और कच्छपका