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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 451 of 889

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Page 451

| ४४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न युक्तमेतत्तीर्थेऽस्मिन्धर्माचरणं पुनः।<br>का शक्तिस्तव युद्धेऽस्ति दर्शयाद्य तपोधन॥ १६इस पवित्र तीर्थमें इस प्रकारका अधर्मपूर्ण आचरण उचित नहीं है। हे तपोधन! आपमें कितनी शक्ति है, इसे युद्धमें अभी प्रदर्शित कीजिये॥ १५-१६॥
व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तस्य नरस्तं प्रत्युवाच ह।<br>युद्धस्वाद्य मया सार्धं यदि ते मतिरीदृशी॥ १७<br>अद्य ते स्फोटयिष्यामि मूर्धानमसुराधम।<br>(युद्धे श्रद्धा न ते पश्चाद्भविष्यति कदाचन।)<br>व्यास उवाचव्यासजी बोले—तब प्रह्लादका वचन सुनकर ऋषि नरने उनसे कहा—यदि आपकी ऐसी ही धारणा है तो मेरे साथ इसी समय युद्ध कर लीजिये। हे असुराधम! आज मैं तुम्हारा सिर विदीर्ण कर डालूँगा (इसके बाद युद्ध करनेकी तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होगी)॥ १७ १/२॥
तन्निशम्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रः कुपितस्तदा॥ १८<br>प्रह्लादो बलवानत्र प्रतिज्ञामारुरोह सः।<br>येन केनाप्युपायेन जे ष्यामि तावुभावपि॥ १९<br>नरनारायणौ दान्तावृषी तपिसमन्वितौ।<br>व्यास उवाचव्यासजी बोले—तब ऋषि नरका वचन सुनकर दैत्यपति प्रह्लाद कुपित हो उठे। बलशाली उन प्रह्लादने प्रतिज्ञा की कि जिस किसी भी उपायसे मैं इन दोनों जितेन्द्रिय तथा परम तपस्वी नर-नारायण ऋषियोंको जीतकर रहूँगा॥ १८-१९ १/२॥
इत्युक्त्वा वचनं दैत्यः प्रतिगृह्य शरासनम्॥ २०<br>आकृष्य तरसा चापं ज्याशब्दञ्च चकार ह।<br>नरोऽपि धनुरादाय शरांस्तीव्राञ्छिलाशितान्॥ २१<br>मुमोच बहुशः क्रोधात्प्रह्लादोपरि पार्थिव॥ २२व्यासजी बोले—ऐसा वचन बोलकर दैत्य प्रह्लादने धनुष उठाकर और शीघ्रतापूर्वक उसे खींचकर प्रत्यंचाकी टंकार की। हे राजन्! मुनि नरने भी धनुष लेकर शिलापर घिसकर तेज किये हुए अनेक तीक्ष्ण बाण प्रह्लादके ऊपर क्रोधपूर्वक छोड़े॥ २०—२२॥
तान्दैत्यराजस्तपनीयपुङ्खै-<br>श्चिच्छेद बाणैस्तरसा समेत्य।<br>समीक्ष्य छिन्नांश्च नरः स्वसृष्टा-<br>नन्यान्मुमोचाशु रुषान्वितो वै॥ २३दैत्यराज प्रह्लादने अपने सुनहले पंखोंवाले बाणोंसे शीघ्र ही उन बाणोंको आते ही काट डाला। तब नर अपने द्वारा छोड़े गये बाणोंको प्रह्लादद्वारा छिन्न किया गया देखकर अत्यन्त कोपाविष्ट हो शीघ्रतासे उनपर अन्य बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २३॥
दैत्याधिपस्तानपि तीव्रवेगै-<br>श्छित्त्वा जघानोरसि तं मुनीन्द्रम्।<br>नरोऽपि तं पञ्चभिराशुगैश्च<br>क्रुद्धोऽहनद्दैत्यपतिं बाहुदेशे॥ २४दैत्यपति प्रह्लादने उन बाणोंको भी अपने द्रुतगामी बाणोंसे काटकर उन मुनिराज नरके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। नरने भी क्रुद्ध होकर अपने तीव्रगामी पाँच बाणोंसे दैत्येन्द्र प्रह्लादके बाहुदेशपर प्रहार किया॥ २४॥
सेन्द्राः सुरास्तत्र तयोर्हि युद्धं<br>द्रष्टुं विमानैर्गगनस्थिताश्च।<br>नरस्य वीर्यं युधि संस्थितस्य<br>ते तुष्टुवुर्दैत्यपतेश्च भूयः॥ २५इन्द्रसहित सभी देवगण उन दोनोंका युद्ध देखनेके लिये विमानोंमें बैठकर आकाशमण्डलमें स्थित हो गये। वे कभी समरांगणमें विराजमान नरके पराक्रमकी प्रशंसा करते थे और फिर कभी दैत्यपति प्रह्लादके पराक्रमकी प्रशंसा करने लगते थे॥ २५॥
ववर्ष दैत्याधिप आत्तचापः<br>शिलीमुखानम्बुधरो यथापः।<br>आदाय शार्ङ्गं धनुरप्रमेयं<br>मुमोच बाणाञ्छितहेमपुङ्खान्॥ २६धनुष धारण किये हुए दैत्यराज प्रह्लाद इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे थे, मानो मेघ जल बरसा रहे हों। [ऋषि नर भी अपना] अप्रतिम शार्ङ्ग धनुष लेकर तीक्ष्ण तथा सुनहले पंखवाले बाण छोड़ रहे थे॥ २६॥