दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)
by महाकवि दण्डी
Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)
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Read in contextतृतीयोच्छासः ] [ बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् ] २३३
( १८ ) अन्येद्युरनन्यथावृत्तिरनङ्गो मय्येवेषुवर्षमवर्षत् । अशुष्यच्च
ज्योतिष्मतः प्रभामयं सरः । प्रासरच्च तिमिरमयः कर्दमः । कार्दमिकनि-
वसनश्च दृढतरपरिकरः खड्गपाणिरुपसंहृतप्रकृतोपस्करः स्मरन्मातृदत्ता-
(१८) अन्येद्युः परदिवसे संकेतिते इत्यर्थः । अनन्यथावृत्तिः-न वर्त्ततेऽन्य-
था अन्यप्रकारा वृत्तिर्व्यापारो यस्य सः मत्पीडनैकव्यग्रः । इषुवर्षं शरवृष्टिम् ।
अशुष्यत्-शुष्कतामभजत् । ज्योतिष्मतः-सूर्यस्य । प्रभामयं आलोकात्मकम् ।
सरः-कासारः अस्तोन्मुखत्वात्सूर्यस्य तेजोह्रासः सञ्जात इति भावः । प्रसारत्-
वृद्धिमगच्छत् । तिमिरमयः अन्धकाररूपः । कर्दमः पङ्कः । सरोवरे शुष्कतां गते
यथा कर्दम एव सर्वतो निर्गच्छति तद्वत् सूर्येऽस्तङ्गते तमोऽपि सर्वत्र प्रसरतीति
भावः । कार्दमिकनिवसनः कर्दमेन रञ्जितं कार्दमिक नीलमित्यर्थः तादृशं निवसनं
वस्त्रं यस्य सः । दृढतरपरिकरः स्थिरतरोद्योगः । उपसम्भृतेति-उपसम्भृतः संगृहीतः
(१८) दूसरे दिन तो कामदेवने अनन्यवृत्ति हो करके मेरे ऊपर ही बाणवर्षण
करना आरम्भ कर दिया । भगवान् भास्करका प्रकाशमान् तलाव सूख गया । अन्धकार-
रूपी कीचड़ आकाशमें फैल गया । अर्थात्-सायंकाल हो गयी और चारो ओर अन्धकार
छा गया । उसी समय मैंने नीले वस्त्रोंको धारण किया । मजबूत कच्छ बाँधा । हाथ में
खड्ग् धारण किया और उस कामके अनुरूप सभी आवश्यक चीजोंको लेकर तथा
वृद्धाधात्रीद्वारा बताये हुए कल्पसुन्दरीके महलके चिह्नोंको ( संकेतस्थलोंको ) स्मरण
गंगाजी जो श्री गणेशजीकी माताकी सोतके समान मानी जाती हैं, अपने प्रवाहमें सौतके
पुत्रकी जलक्रीड़ाको करना न सह सकीं । उन गंगाजीने गणेशजीको शाप दिया कि तुम
'नरत्वको प्राप्त करो।' इस अहेतुक शापपर गणेशजी क्रोधित हो गये और उन्होंने
गंगाजीको शाप दे दिया कि 'तुम मृत्युलोकमें जाकर बहुपतिगामिनी हो।' इस शापपर
गंगाजीने श्रीगणेशजीकी बड़ी स्तुति की तब गणेशजीने कहा कि 'मेरा शाप वृथा नहीं हो
सकता है। पर तुम जो स्तुति करती हो कि यह शाप नष्ट हो जाय, सो इसपर तुम्हारे
ऊपर मैं दया करके यही कर सकता हूँ कि मैं तुम्हारे लिये अपने अंशके दो भाग करके
पृथिवीपर अवतरित होऊँगा । एक अंश स्वल्प होगा दूसरा अंश कुछ अधिक । अतः स्वल्पांश
से मैं विकटवर्मा और बृहदांशसे मिथिलापति प्रहारवर्मा का पुत्र उपहारवर्मा होऊँगा । उस
समय तुम भी कामरूपाधिपति कालिंगवर्माकी पुत्री कल्पसुन्दरीके रूपमें पैदा होभोगी तब
प्रथम विकटवर्माके मरनेपर वह स्वल्पांश भी उपहारवर्माके रूपमें आ मिलेगा। उस समय
तुम मेरे पूर्णरूप प्रहारवर्मासे उद्वाहित हो करके सदाके लिए इस शाप से मुक्त होओगी।
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu