चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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६६ चरकसंहिता [ अ० ४
वाले) क्रूर कर्मों को न करने वाला, दूरदर्शी, धर्म, अर्थ और काल दत्तचित्त
पुरुष को 'ऐन्द्र' समझे ॥ ४० ॥
लेखास्थवृत्तं प्राप्तकारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्य-
लम्भिनं व्यपगतराग-द्वेष-मोहं याम्यं विद्यात् ॥ ४१ ॥
(४) याम्य—जो कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की मर्यादा के भीतर रहनेवाला,
प्राप्तकारी, ( अवसर के अनुसार काम करने वाला ), असंप्रहार्य अर्थात् जिस
पर कोई प्रहार न कर सके वा जिसकी मार रोकी न जा सके, उन्नतिशील,
स्मृतिमान्, ऐश्वर्य्यशील, राग, द्वेष, मोह से रहित पुरुष हो उसको 'याम्य'जाने ४१
शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं यज्वानमम्भोविहार-रतिमक्लिष्टकर्माणं
स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात् ॥ ४२ ॥
( ५ ) वारुण—जो शूरवीर, धीर, पवित्र ओर मैलेपन से द्वेष करनेवाला
यज्ञ करने वाला, जल क्रीड़ा मे रत, क्लिष्ट कर्मों से भिन्न सुख से होने वाले
कर्मों को करने वाला, उचित स्थान में कोप तथा प्रसाद करने वाला पुरुष हो
उसको 'वारुण जाने ॥ ४२ ॥
स्थान मानोपभोगपरिवारोपसपन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं
शुचिं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात् ॥ ४३ ॥
( ६ ) कौवेर—जो स्थान, मान, उपभोग, सामग्री, परिवार ( कुटुम्ब )
से युक्त, नित्य धर्म, अर्थ और काम में तत्पर, पवित्र सुखपूर्वक विहार विनोद
करने वाला, उचित स्थान पर कोप और प्रसन्नता प्रकट करने वाला पुरुष हो
उसको 'कौवेर' प्रकृति का जाने ॥ ४३ ॥
प्रिय-नृत्य गीत-वादित्रोल्लापक-श्लोकाख्यायिकेतिहास-पुराणेषु कुशलं
गन्ध-माल्यानुलेप-नव-वसन-स्त्रीविहार-नित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात्
( ७ ) गान्धर्व—जो नृत्य, गीत, बाजे, स्तोत्र, श्लोक, आख्यायिका,
इतिहास, पुराणों को पसन्द करने वाला, इनमें कुशल, सुगन्ध, माला, अनु-
लेपन, वस्त्र, स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अनिन्द्य पुरुष हो उसको
'गान्धर्व' जाने ॥ ४४ ॥
इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात्कल्याणांशत्वात्,
संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत् ॥ ४५ ॥
ये शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं, ये शुभ या कल्याण के अंश है। इसके संयोग
होने से 'ब्राह्म' को ही सब से अधिक शुद्ध निर्दोष जाने ॥ ४५ ॥
राजस सत्त्व के ६ भेद—