Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 80 of 616

Read in context
Page 80

अ० ४ ] ५ शारीरस्थानम् ६५
तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वानामेकैकस्य भेदाग्रमपरिसंख्येयं तरतम-
योगाच्छरीर-योनि-विशेषेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च । शरीरमपि
सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरं । तस्मात्कतिचिच्च सत्त्वभेदाननू-
कसाद्दश्याभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यामः ॥ ३७ ॥
सत्त्व ( मन ) तीन प्रकार का है । शुद्ध, राजस और तामस । इनमें शुद्ध
( सात्त्विक ) दोषरहित है, क्योंकि यह शुभ ( कल्याण ) कामना का अंश है ।
राजस दोष युक्त है ? क्योंकि वह रोष का अंश है । तामस भी दोष युक्त है
क्योकि वह मोह का अंश है । इन तीनों सत्त्वों में से एक एक के भेद तर,
तम, योग से शरीरविशेष, योनि विशेष और एक दूसरे में परस्पर मे मिले होने
से असख्य हा जाते है । शरीर भी सत्त्व ( मन ) के अनुसार होता है और
मन शरीर के अनुसार होता है । इनमे से कुछ भेदों की तुल्यता दिखाते हुए
यहा पर दृष्टान्त रूप में बतलाते है ॥ ३६-३७ ॥
तद्यथा—शुचिं सत्याभिसंधं जितात्मानं सविभागिनं ज्ञान-विज्ञा-
न-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-सपन्नं स्मृतिमन्तं काम-क्रोध-लोभ-मान-
मोहेर्ष्या-हर्षामर्षोपेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ॥ ३८ ॥
सात्त्विक चित्तो के सात भेद—( १ ) ब्राह्म—पवित्र, सत्य प्रतिज्ञावाला,
जितात्मा, सम्पत्ति और सत्फल को अन्यों में बाटकर भोगने वाला, ज्ञान-
विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति से युक्त, स्मृतिमान्, काम, क्रोध,
लोभ, अभिमान, मोह, ईर्ष्या, हर्ष और क्रोध से रहित, सब प्राणियों में सम
बुद्धि रखने वाला हो उसे ब्राह्म प्रकृति जाने ॥ ३८ ॥
इज्याध्ययन-व्रत-होम-ब्रह्मचर्य-परमतिथिव्रतमुपशान्त-मद-मान—
राग-द्वेष-मोह-लोभ-रोषं प्रतिभा-वचन-विज्ञानोपधारण-शक्ति-संपन्नमार्षं
विद्यात् ॥ ३९ ॥
( २ ) आर्ष—जो यज्ञ करने वाला, अध्ययनशील, व्रत का पालक होम-
शील ब्रह्मचर्य का पालक, अतिथि का पूजक, मद, मान राग, द्वेष, मोह, लोभ
और रोष से रहित, प्रतिभा से युक्त वचन, विज्ञान, उपधारण इन शक्तियों से
सम्पन्न पुरुष हो उसको आर्ष चित्त वाला जाने ॥ ३९ ॥
ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लि-
ष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात् ॥ ४० ॥
( ३ ) ऐन्द्र—जो ऐश्वर्यवान्, ग्रहण करने योग्य वाक्य वाला, यज्ञ करने
वाला, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त, साहसिक ( बुरे, दूसरे पर आघात पहुँचाने