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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६३१
भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् ॥ २३७ ॥
त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान्व्याधीन्सृजन्ति वा ।
पथ्य ( हितकारी ) और अपथ्य ( अहितकारी ) को मिला कर एक साथ
खाने को 'समशन' कहते हैं । मात्रा से बहुत या थोड़ा भोजन करने अथवा
भोजन के समय से पूर्व अथवा पीछे भोजन करने को 'विषमाशन' कहते हैं ।
प्रथम खाये हुए अन्न शेष के जीर्ण होने से बचे रहने पर पुनः भोजन करने को
'अध्यशन' कहते है । समशन, विषमाशन और अध्यशन ये तीनों ही मृत्यु
अथवा भयानक रोगो को उत्पन्न करते है ॥ २३६-२३७- ॥
प्रातराशे त्वजीर्णेऽपि सायमाशो न दुष्यति ॥ २३८ ॥
दिवा प्रबुध्यतेऽर्केण हृदयं पुण्डरीकवत् ।
तस्मिन्विबुद्धे स्रोतांसि स्फुटत्वं यान्ति सर्वशः ॥ २३६ ॥
व्यायामाच्च विचाराच्च विक्षिप्तत्वाच्च चेतसः ।
न क्लेदमपगच्छन्ति दिवा तेनास्य धातवः ॥ २४० ॥
अक्लिन्नेष्वन्नमासक्तमन्यत्तेषु न दुष्यति ।
अविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद्विमिश्रितम् ॥ २४१ ॥
नैव दूष्यति तेनैव समं संपद्यते यथा ।
रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृतेष्वयनेषु च ॥ २४२ ॥
यान्ति कोष्ठे च विक्लेदं संवृते देहधातवः ।
क्लिन्नेष्वन्यदपक्वेषु तेष्वासिक्तं प्रदुष्यति ॥ २४३ ॥
विदग्धेषु पयःस्त्वन्यत्पयस्तेष्विवार्पितम् ।
नैशेष्वाहारजातेषु नाविपक्वेषु बुद्धिमान् ॥
तस्मादन्यत्समश्नीयात्पालयिष्यन्बलायुषी ॥ २४४ ॥
प्रातःकालं का किया हुआ भोजन यदि जीर्ण न हो तो भी यदि सायकाल
का भोजन कर लिया जाये तो वह दोष उत्पन्न नही करता । क्योंकि दिनमे हृदय
कमल के समन सूर्य के द्वारा विकसित रहता है । (हृदय अधिक क्रियाशील है,
मस्तिष्क कार्य करता रहता है ) इस हृदय ( वात-सस्थान ) के जागृत रहने पर
सब स्रोत खुले रहते है । मनुष्य के व्यायाम करने, चलने-फिरने से, विचार
( चिन्तन ) से, चित्त के विक्षेप से, दिन मे शरीर के धातु शुष्क हो जाते हैं ।
इन अक्लिन्न धातुओं मे प्रक्षिप्त अन्य अन्न ऐसे ही दूषित नहीं होता जैसे बिना
विदग्ध हुए ( फटे ) दूध मे नया दूध मिलाने से कोई भेद नहीं आता । रात्रि
मे हृदय की गति के कम होने से ( वात-संस्थान मस्तिष्क के सो जाने से )
और स्रोतों के बन्द हो जाने पर, कोष्ठ मे पाचन-क्रिया के रुक जाने से शरीर