चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
पृष्ठ 585, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 585अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०१
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०१
सूजन हो जाती है। अस्थियो तथा पोरुओ मे दर्द रहता है। रोगी को वमन
और ज्वर रहता है। रोगी को जो डकार (उद्गार) आते है उनमे रक्त की सी
गन्ध रहती है, ये उद्गार तिक्त (कटु) और अम्ल रससे युक्त होते हैं १॥५३-५४॥
पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽऽलस्यं बलक्षयः ।
विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ५५ ॥
ग्रहणी के पूर्वरूप - प्यास, आलस्य, बल की क्षीणता, अन्न का विदाह
होना, अन्न का देर मे पचना और शरीर मे भारीपन प्रतीत होना ये ग्रहणी-रोग
के पूर्वरूप हैं ॥ ५५ ॥
अग्न्याधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता ।
नाभेरुपरि सा ह्यग्निवलोपस्तम्भवृंहिता ॥ ५६ ॥
अपक्वं धारयत्यन्नं पक्कं सृजति पार्श्वतः ।
दुर्बलाग्निबलाद् दुष्टा त्वाममेव २ विमुञ्चति ॥ ५७॥
ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति-ग्रहणी का स्थान अग्नि का आश्रय स्थान है।
वह अन्न को ग्रहण करती है इस कारण इस को 'ग्रहणी' कहते है। यह ग्रहणी
भाग नाभि से ऊपर कोष्ठ मे स्थित है। वहा पर यह ग्रहणी अग्नि के बल की
सहायता से स्थित और पुष्ट होकर आमाशय से आये कच्चे (अपरिपक्व) अन्न
को धारण करती है और दूसरे पके हुए अन्न को (क्षुद्र आतो मे) त्याग करती
हैं। जब अग्नि दुर्बल होती है तो दुष्ट हुई ग्रहणी अपक्व अन्न को नही पचाती।
वैसे का वेसे ही न पचे हुए अन्न को वह ग्रहणी इस मार्ग से त्याग करने
लगती है ३ ॥ ५६-५७ ॥
१. सुश्रुत में कहा भी है-
एकश. सर्वशश्चैव दौषैर्व्यर्थमूर्च्छितै. ।
सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥
पक्कं वा सरुज पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् ।
ग्रहणीरोगमाहुस्त आयुर्वेदाविदो जना. ॥
२. 'दुर्बलाग्न्यबलाद्दुष्टादाममेव' इति च पाठः ।
३. ग्रहणी भाग पर क्लोम रस, पित्ताशय का पित्त और आतों का क्षारीय
रस आकर मिलते हैं। जिनकी सहायता से आमाशय से श्वेत रस (काईंल)
के रूप में आया-अपक्व आहार रस मिल कर पक्कावस्था मे आता है ! जिस
समय ग्रहणी भाग निर्बल हो जाता है उस समय उपरोक्त रस भोजन के साथ
नहीं मिलते, जिससे वह अपक्कावस्था मे ही आतों मे चला जाता है । ये सब