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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 616 में से

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पृष्ठ 548

५६४ चरकसंहिता [ अ० १४
जन्य अस्सी रोग तथा कफजन्य बीस रोग इस प्रकार से एक सौ रोग तक्र से
नष्ट होते है । वातजन्य और कफजन्य रोगो के लिये तक्र से उत्तम और कोई
औषध नही है ॥ ८८-८६ ॥
पिप्पली पिप्पलीमूल चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ।
शृङ्गवेरमजाजी च कारवी वान्यतुम्बरुम् ॥ ६० ॥
बिल्वं कर्कटकं पाठा पिष्ट्वा पेया विपाचयेत् ।
फलाम्ला यमकैर्भृष्टा ता दद्याद् गुदजापहाम् ॥ ६१ ॥
एतैरेव खडान् कुर्यादेतैश्चैव पचेज्जलम् ।
( १३ ) पिप्पली, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपिप्पली, आर्द्रक, जीरा, क्षुद्र-
जीरा ( काली जीरी ), धनिया, तुम्बरू ( धनिये का भेद ), बेलगिरी, कर्कटक
( ककोड़ा ), पाठा इनको पीस कर इनसे पेया बनानी चाहिये । इस पेया को
अनार-रस आदि फलों से खट्टी करके तथा तेल आर घी यमक स्नेह से स्निग्ध
बना कर पीना चाहिये, ये अर्श-रोग नाशक हैं। इन्ही वस्तुओं से खड ( यूष-
भेद ) बनाने चाहिये, इनसे ही जल पकाना चाहिये और इन वस्तुओ से घृत
सिद्ध करना चाहिये ॥ ६०-६१ ॥
एतैश्चैव घृतं साध्यमर्शसां विनिवृत्तये ॥ ६२ ॥
शटीपलाशसिद्धां वा पिप्पल्या नागरेण वा ।
दद्याद्यवागूं तक्राम्लां मरिचैरवचूर्णिताम् ॥ ६३ ॥
शुष्कमूलकयूषं वा यूषं कौलत्थमेव वा ।
दधित्थबिल्वयूषं वा सकुलत्थमकूष्ठकम् ॥ ६४ ॥
( १४ ) अर्श-रोग की निवृत्ति के लिये कचूर, ढाक, पिप्पली, सोंठ से सिद्ध
यवागू को तक्रसे खट्टी बना कर इसमे मरिच का चूर्ण डाल कर देना चाहिये ।
सूखी मूली का यूष अथवा कुलत्थो के यूष का या कैथ और बेलगिरी के यूष
को अथवा कुलत्थी और मोठ के यूष को देना चाहिये ॥ ६२-६४ ॥
छागलं वा रसं दद्याद्युषैरेतैर्विमिश्रितम् ।
लावादीना फलाम्लं वा सतक्रं ग्राहिभिर्युतम् ॥ ६५ ॥
उपरोक्तयूषों के साथ बकरे का मास-रस या बटेर आदि पक्षियों का मास-
रस मिला कर देना चाहिये । मल संग्राहक बेलगिरी, पाठा आदि के चूर्ण से
युक्त, अनार आदि फलों से या तक्र से खट्टा करके यूषों को देना चाहिये ॥६५॥
१ वाग्भट मे कहा भी है—अमद्यपो वा पिबेच्च शृतशीतमल्पमुदक शृत
धान्यानागराभ्याम् । लघुना पंचमूलेन वा, पचकोलाजाजीकारवीगजशौण्डीबि-
ल्वंशलाठुपाठातुम्बरुधान्यकैर्वा । एभिरेव घृत साधयेत् ।