चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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यथार्हं१ स्निग्धकोष्ठेन पेयमेतद्विरेचनम् ।
इति नारायणचूर्णम् ।
भगन्दर, पाण्डुरोग, श्वास, कास, गलग्रह, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, कूठ,
अग्निमान्द्य, ज्वर, दंष्ट्रा-विष ( जागम विष ), मूल विष ( स्थावर विष ), सगर
( निर्विष द्रव्य सयोगज विष ) मे और कृत्रिम ( विष द्रव्य सयोगज विष ) मे
यथायोग अनुपान के साथ पीना चाहिये२ ॥ १३०-१३१ ॥
हपुषा काञ्चनक्षीरी त्रिफला कटुरोहिणी ॥ १३२ ॥
नीलिनी त्रायमाणा च शातला त्रिवृता वचा ।
सैन्धवं काललवणं पिप्पली चेति चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥
दाडिमत्रिफलामासरसमूत्रसुखोदकैः ।
पेयोऽयं सर्वगुल्मेषु प्लीह्नि सर्वोदरेषु च ॥ १३४ ॥
कुष्ठे श्वित्रे सरुजके सवाते विषमाग्निषु ।
शोथार्शःपाण्डुरोगेषु कामलाया हलीमकै ॥ १३५ ॥
वातं पित्त कफ चाऽऽशु विरेकात्सप्रसाधयेत् ।
इति हपुषाद्य चूर्णम् ।
( ४ ) हपुषाद्य-चूर्ण—हपुषा ( हऊबेर ), स्वर्ण क्षारी, त्रिफला, कुटकी,
नीलिनी, त्रायमाणा, सातला, निशोथ, वच, सैन्वा नमक, काला लवण ( सचल
या बिड् नमक ), पिप्पली ये सब समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । इस चूर्ण
को सब प्रकार के गुल्मो मे, प्लीहा मे उदर-रोगो मे, कुष्ठ मे, श्वित्र-रोग में,
दर्द युक्त उदर-रोग मे, वातयुक्त उदर विकार मे, अग्नि के विषम होने पर,
शोथ, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलीमक-राग मे, अनार, त्रिफला, मास रस,
मूत्र और गरम पानी जो योग्य अनुपान इनमे से दीखे उसके साथ लेना
चाहिये । अनार का रस ओर त्रिफला का क्वाथ बरतना चाहिये । इस प्रकार लेने
से यह चूर्ण विरेचन द्वारा वात, पित्त, कफ का साधन कर देता है ॥१३२-१३५॥
नीलिनी निचुलं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणानि च ॥ १३६ ॥
चित्रक च पिबेच्चूर्णं सर्पिषोदरगुल्मनुत् ।
इति नीलिल्याद्यं चूर्णम् ।
१ 'यथार्थ' इति वा पाठः ।
२ स्थावर जागमं चेति विष प्रोक्तमकृत्रिमम् ।
कृत्रिम गरसज्ञन्तु क्रियते विविधौषधैः ॥
सयोगे द्विविध प्रोक्तं तृतीय विषमुच्यते ।
गरं स्यादविषं तत्र सविष कृत्रिमं मतम् ॥