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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 616 में से

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पृष्ठ 484

५०० चरकसंहिता [ अ० १२
प्रस्थार्धमात्रं मधुनः सुशीते किञ्चिच्च चूर्णादपि यावशूकात् ।
एकाभया प्राश्य ततश्च लेहाच्छुक्तिं निहन्ति श्वयथुं प्रवृद्धम् ॥५०॥
श्वासज्वरारोचकमेहगुल्मप्लीहत्रिदोषोदरपाण्डुरोगान् ।
कार्श्यमवातास्रगम्लपित्तं वैवर्ण्यमूत्रानिलशुक्रदोषान् ॥ ५१ ॥
इति कसहरीतकी ।
( १८ ) कस-हरीतकी—दशमूल का क्वाथ एक कस ( आढक ), गुठली
रहित हरडे १००, गुड़ १०० पल लेकर पकावे । जब अवलेह सिद्ध हो जाये
तो उतार ले ओर इसमे सोठ, मरिच, पिप्पली, दालचीनी, इलायची, तेजपात
इनका चूर्ण मिला दे । खूब ठण्डा हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ओर जोखार
१ कर्ष मिला दे । इसमे से एक हरड खाकर ऊपर से आधा पल अवलेह चाट
ले । इसके खाने से अत्यन्त बढ़ा हुआ शोथ-रोग, श्वास, ज्वर, अरोचक, प्रमेह,
गुल्म, प्लीहा, सन्निपातजन्य उदर, पाण्डु-रोग, कृशता, आमवात, रक्तपित्त,
अम्लपित्त, विवर्णता, मूत्र, वायु और शुक्र-रोग नष्ट होते है१ ॥ ४६-५१ ॥
पटोलमूलासुरदारुदन्तीत्रायन्तिपिप्पल्यभयाविशालाः ।
यष्ट्याह्वयं तिक्तकरोहिणी च सचन्दना स्यान्निचुलानि दार्वी ॥५२॥
कर्षोत्थितैस्तैः कथितः कषायो घृतेन पेयः कुडवेन युक्तः ।
वीसर्पदाहज्वरसन्निपातांस्तृष्णां विषाणि श्वयथुं निहन्ति ॥५३॥
इति पटोलमूलादिघृतम् ।
(१६) पटोलमूलाद्यघृत-पटोलमूल, देवदार, दन्ती, त्रायन्ती ( त्रायमाणा ),
पिप्पली, हरड़, विशाला ( इन्द्रायण ), मुलहठी, कुटकी, चन्दन, निचुल
( जलवेतस, समुद्रफल ), दारुहल्दी प्रत्येक द्रव्य एक कर्ष इनको चौबीस पल
जल मे क्वाथ करके चतुर्थांश करले । इस क्वाथ मे एक कुडव ( चार पल )
घी मिला कर पीवे । इस प्रकार से बना यह कषाय वीसर्प, दाह, सन्निपात ज्वर,
तृष्णा, विष और शोथ को नष्ट करता है ॥ ५२-५३ ॥
सचित्रकं धान्ययवान्यजाजीसौवर्चलं त्र्यूषणवेतसाम्लम् ।
बिल्वात्फलं दाडिमयावशूकौ सपिप्पलीमूलमथोऽपि चव्यम् ॥५४॥
पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि जलाढकेन पक्त्वा घृतप्रस्थमथ प्रयुञ्ज्यात् ।
१ वृद्ध वाग्भट मे—
'दशमूलक्वाथकसे पथ्याशत गुड़तुलामिश्रमधिश्रयेत् ।
लेहीभूते तत्र त्रिकटुकत्रिजातकयवक्षारचूर्णं प्रक्षिपेत् क्षौद्रार्धप्रस्थ च ॥'