चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें४८० चरकसंहिता [ अ० ११
ऋद्धिं परूषकं भार्गी मृद्वीकां बृहतीं तथा ॥ ३६ ॥
शृङ्गाटकं तामलकीं पयस्यां पिप्पलीं बलाम् ।
बदराक्षोटखर्जूरवातामाभिषुकाण्यपि ॥ ३७ ॥
फलानि चैवमादीनि कल्कान् कुर्वीत कार्षिकान् ।
धात्रीरसविदारीक्षुच्छागमांसरसं पयः ॥ ३८ ॥
एषां प्रस्थोन्मितान् भागान् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
प्रस्थार्धं मधुनः शीते शर्कराऽर्धतुला तथा ॥ ३९ ॥
द्विकार्षिकाणि पत्रैलाहेमत्वङ्मरिचानि च ।
चूर्णितानि विनीयास्माल्लिह्यान्मात्रां सदा नरः ॥ ४० ॥
अमृतप्राशमित्येतन्नराणाममृतं घृतम् ।
सुधामृतरसं प्राश्य क्षीरमांसरसाशिना ॥ ४१ ॥
नष्टशुक्रक्षतक्षीणदुर्बलव्याधिकंपितान् ।
स्त्रीप्रसक्तान्कृशान्वर्णस्वरहीनांश्च बृंहयेत् ॥ ४२ ॥
कासहिक्काज्वरश्वासदाहतृष्णास्रपित्तनुत् ।
पुत्रदं वमिमूर्च्छाहृद्योनिमूत्रामयापहम् ॥ ४३ ॥
इत्यमृतप्राशघृतम् ।
( १५ ) अमृतप्राश-घृत—कल्कार्थ—जीवक, ऋषभक, शतावरी, जीवन्ती,
सोंठ, कचूर, मूगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मेदा, महामेदा, का-
काली, क्षीरकाकाली, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा,
मुलहठी, कौंच, शतावरी, ऋद्धि, फालसा, भार्गी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, सिंघाढ़ा,
तामलकी ( भूई आवला ), पयस्या ( विदारी ), पिप्पली, खरैटी, बदर ( बेर ),
अक्षोट ( अखराट ), खजूर, बाताम ( बादाम ), अभिषुक ( पिस्ता ) इसी
प्रकार के अन्य मधुर, स्निग्ध और बृंहण फल प्रत्येक एक-एक कर्ष, आवले
का स्वरस, विदारी का रस, गन्ने का रस, बकरे के मास का रस और गाय का
दूध प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर इनके साथ घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । सिद्ध होकर
शीतल हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ( आठ पल ), शर्करा पचास पल, मरिच,
दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर प्रत्येक आधा पल लेकर इनका चूर्ण
इसमे मिला देवे ।
यह घृत क्षतक्षीण व्यक्तियों के लिये अमृत के समान है । सुधा और अमृत
के समान है१, इस घी को खाकर पीछे से दूध और मास रस के साथ अन्न खावे ।
१ सुधा और अमृत दोनो पर्याय है तथापि इतना विवेक है कि नागों ने-