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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 616 में से

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पृष्ठ 460

४७६ चरकसंहिता [ अ० ११
( भोजन का अविपाक या न पचना ), उत्पन्न हो जाता है । बार बार खासी
आती है, खासने मे दूषित, काला या पीला, दुर्गन्धयुक्त, बँधा हुआ ( ग्रथित ),
मात्रा मे बहुत तथा रक्त मिश्रित कफ बाहर आता है । शुक्र और ओज के
क्षीण होने से उर क्षत का रोगी अत्यन्त क्षीण ( दुर्बल ) हो जाता है ॥६-११॥
अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ १२ ॥
छाती मे दर्द आदि पूर्वोक्त लक्षण जब तक अव्यक्त या थोड़े से व्यक्त
होते हैं, वही इस रोग के पूर्वरूप है ॥ १२ ॥
उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते ।
क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ १३ ॥
उरःक्षत होने पर—छाती मे दर्द, रक्त का वमन ओर कास विशेष रूप से
होता है । क्षतक्षीण अर्थात् शुक्र के क्षय से रक्तमिश्रित मूत्र तथा पार्श्व, पीठ
और कटि मे जकडाहट, वेदना अथवा स्थिरता आ जाती है ॥ १३ ॥
अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्ने साध्यो बलवतो नवः ।
परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं तु वर्जयेत् ॥ १४ ॥
साध्य और असाध्य के रूप—यदि रोगी बलवान् हो, अग्नि भी प्रदीप्त
हो, लक्षण थोडे हों और रोग नया ( एक साल से कम का ) हो तो वह साध्य
होता है । जो रोग एक साल पुराना हो गया हो तो वह याप्य है, जिस रोगी
मे सब लक्षण विद्यमान हों वह असाध्य है । वह चिकित्सा करने योग्य
नहीं है ॥ १४ ॥
चिकित्सा—
उरो मत्वा क्षतं लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् ।
सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽद्यात्सशर्करम् ॥ १५ ॥
(१) जब छाती मे क्षत हुआ पता लगे तब लाख को मधु मे मिला
कर दूध के साथ पी लेवे । इसके जीर्ण होने पर दूध और शर्करा के साथ
अन्न खावे १ ॥ १५ ॥
पार्श्वबस्तिरुजश्चाल्पपित्ताग्निस्ता सुरायुताम् ।
भिन्नविट्कः समुस्तातिविषा पाठा सवत्सकाम् ॥ १६ ॥
(२) रोगी को पार्श्वशूल और बस्तिशूल हो तथा अल्पपित्त और अल्पाग्नि
१ अष्टांगसंग्रह मे कहा है—
उरस्यन्त क्षते सद्यो लाक्षा क्षौद्रयुता पिबेत् ।
क्षीरेण शालीन् जीर्णेऽद्यात् क्षीरेणैव सशर्करान् ॥