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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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१६ चरकसंहिता [ अ० १
क्षेत्रज्ञ आत्मा का आदि नहीं है। क्षेत्र अर्थात् शरीर की परम्परा (एक
छूटने पर दूसरा प्राप्त होना) भी अनादि है। आत्मा का शरीर के साथ प्रथम
सम्बन्ध कब हुआ इस को कोई नहीं जानता। इसलिये दोनों के अनादि होने
से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में कौन पहिले था यह नहीं कहा जा सकता ॥ ८२ ॥
ज्ञः साक्षीत्युच्यते नाज्ञः साक्षी ह्यात्मा यतः स्मृतः।
सर्वे भावा हि सर्वेषा भूतानामात्मसाक्षिकाः ॥ ८३ ॥
ज्ञानवान् चेतन ही साक्षी कहा जाता है, अज्ञानवान् पाषाण आदि को
साक्षी नहीं कहते। इसलिये आत्मा ही साक्षी है। आकाश आदि (अव्यक्त)
सब भूतों के सब ग्राह्य धर्म आत्मा को ही साक्षात् होते हैं ॥ ८३ ॥
नैकः कदाचिद् भूतात्मा लक्षणैरुपलभ्यते ।
विशेषोऽनुपलभ्यस्य तस्य नैकस्य विद्यते ॥ ८४ ॥
संयोगपुरुषस्येष्टो विशेषो वेदनाकृतः ।
वेदना यत्र नियता विशेषस्तत्र तत्कृतः ॥ ८५ ॥
अकेला, केवल शरीर से भिन्न आत्मा कभी भी लक्षणों से उपलब्ध नहीं होता।
इसलिये लक्षणों से जिसकी उपलब्धि न हो सके ऐसे आत्मा मे वेदनाकृत कोई
विशेष धर्म नहीं है। वेदनाजन्य विशेष धर्म संयोगजन्य पुरुष अर्थात् राशिसंज्ञक
पांचभौतिक शरीर-पुरुष में ही होते हैं। क्योंकि सुख दुःख रूप वेदनाए जहा रहती
हैं वहीं पर इन वेदनाओं से होने वाले विशेष धर्म भी रहते हैं ॥ ८४-८५ ॥
चिकित्सति भिषक्सर्वास्त्रिकाला वेदना इति ।
यथा युक्त्या वदन्त्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ ८६ ॥
पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः ।
पुनः स कासो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता ॥ ८७ ॥
एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम् ।
कालश्चायमतीतानामार्तीना पुनरागतः ॥ ८८ ॥
तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत्प्रयुज्यते ।
अतीताना प्रशमन वेदनाना तदुच्यते ॥ ८९ ॥
आपस्ताः पुनरायाता याभिः शल्यं पुरा हतम् ।
यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽऽश्रये ॥ ९० ॥
पूर्वरूपं विकाराणा दृष्ट्वा प्रादुर्भाविष्यताम् ।
'या क्रिया क्रियते सा च वेदना हन्त्यनागताम् ॥ ९१ ॥
पारम्पर्यानुबन्धस्तु दुःखाना विनिवर्तते ।
सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ ९२ ॥