चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १ ] शारीरस्थानम् १५
मन अचेतन और क्रियावान् है। शरीर को चेतन करने वाला आत्मा
चेतन मन से भी पर अर्थात् मुख्य है। क्रियाशील मन के साथ इस विभु आत्मा
का योग होने पर आत्मा की ही वे सब क्रिया कही जाती हैं। क्योंकि आत्मा
चेतनावान् है, इसी लिये वह कर्ता कहा जाता है। मन क्रियावान् होने पर भी
अचेतन है, इसलिये कर्ता नहीं कहा जाता ॥ ७५-७६ ॥
यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं नयते सर्वयोनिषु ।
प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी न ह्यन्योऽस्त्यस्य तन्त्रकः ॥ ७७ ॥
वशी तत्कुरुते कर्म यत्कृत्वा फलमश्नुते ।
वशी चेत समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति ॥ ७८ ॥
आत्मा सब प्राणियों, नर, पशु आदि योनियो मे अपने आप अपने को ले
जाता है और अपने आप अपने को प्राणों से युक्त करता है। इस आत्मा का
कोई दूसरा सचालक नहीं है। वह स्वयं वशी ( सब को परवश करने वाला )
आत्मा उस कर्म को करता है जिसे करके वह फल भोगता है। वह वशी आत्मा
ही चित्त को लगाता है और वह वशी ही सब कुछ त्याग देता है । [ अर्थात्
वही फलार्थी होकर कर्म करता है और चाहे तो कभी फलाकाक्षा को त्याग भी
सकता है ] ॥७७-७८॥
देही सर्वगतो ह्यात्मा स्वे स्वे सस्पर्शनेन्द्रिये ।
सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः ॥ ७९ ॥
आत्मा सब मे व्याप्त होकर भी देहवान् बनकर केवल अपनी स्पर्शननेन्द्रिय
से युक्त देह मे रहता है। इसलिये अन्य सब शरीरों की वेदनाओ को नहीं जानता ७९
विभुत्वमत एवास्य यस्मात्सर्वगतो महान् ।
मनसश्च समाधानात्पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम् ॥ ८० ॥
आत्मा सब मे व्याप्त और महा परिमाण है, अत 'विभु' है । मन को
एकाग्र कर, समाधि के बल से भित्ति आदि से छिपे पदार्थों को भी देख लेता है।८०।
नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना ।
सर्वयोनिगतं विद्यादेकयोनावपि स्थितम् ॥ ८१ ॥
शरीर और कर्मों का अनुसरण करने वाले मन के साथ आत्मा का नित्य
सम्बन्ध है। वह एक योनि में स्थित होने पर भी उसे मन के द्वारा सब योनियों
मे व्याप्त समझना चाहिये ॥ ८१ ॥
आदिर्नास्त्यात्मन क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम् ।
अतस्तयोरनादित्वात्कि पूर्वमिति नोच्यते ॥ ८२ ॥