चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १ ] शारीरस्थानम् ६
कारण रूप पुरुष सब प्रमाणों से सिद्ध है । जिन सब प्रमाणों से प्रमेय जाना
जाता है, उन सब प्रमाणों (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि) से पुरुष कारण
है, यही ज्ञान होता है ॥ ४५ ॥
न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्यसमुत्थिताः ।
सारूप्यात्ते त एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नवाः ॥ ४६ ॥
भावस्तेषां समुदयो निरीशः सत्त्वसंज्ञकः ।
कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥ ४७ ॥
नास्तिक मत—जो शरीर में जल आदि पदार्थ दिखाई देते हैं। वे वे
नहीं हैं। परन्तु परम्परा से उत्पन्न वे उनके सदृश वा भिन्न ही पदार्थ हैं।
समान रूप होने से नये से नये भी वे ही हे, ऐसे कहे जाते हैं। उनका समु
दाय जिसका कोई स्वामी नहीं है, 'सत्त्व' कहाता है, पुरुष कोई कर्त्ता और
भोक्ता नहीं है, ऐसा कई मानते हैं। इसी प्रकार जो भाव बाल्यावस्था में होते
हैं वे यौवनावस्था में नहीं रहते । अन्य भाव पूर्व के समान होते हैं, परम्परा
से उत्पन्न होने के कारण उनके समान होते हैं। इस प्रकार से नये से नये भाव
समान रूप और सादृश्य होने से वे ही (पूर्वके ही) कहे जाते हैं। बाल्यावस्था
के देवदत्त युवावस्था में भी रहता है। इन भावों का समुदाय (पूर्वापर
सन्तान) आत्मारहित सत्त्व-सञ्ज्ञक, प्राणी होता है। इनके मत में कर्त्ता, कर्मों
का भोक्ता, देह से अतिरिक्त पुरुष नहीं है। ऐसा कोई देह को ही आत्मा
मानने वाले नास्तिक मानते हैं ॥ ४६--४७॥
तेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवा फलम् ।
भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते ॥ ४८ ॥
नास्तिक मत में दोष—जो लोग शरीर से पृथक् आत्मा की स्थिति नहीं
मानते उनके मत में अन्य 'भावों' (पदार्थों) द्वारा किये शुभाशुभ कर्मों के
फल उनके समान नये नये अन्य 'भाव' भोगते हैं। जो कर्म करते हैं उन को
किये कर्म का फल भोगना नहीं पडता ॥ ४८ ॥
करणान्यन्यथा दृष्ट्वा कर्तु कर्ता स एव तु ।
कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥ ४९ ॥
करने वाले कर्त्ता के करण भी अनेक देखे जाते हैं। परन्तु करने वाला
वह अकेला होता है। इसी प्रकार यह कर्त्ता इन्द्रिय आदि अनेक उपकरणों से
युक्त होकर दर्शन आदि नाना कर्म करता है। इसलिये देह से भिन्न आत्मा
सब कर्मों का कारण है ॥४९॥