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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 624 of 639

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Page 624

६०६ चरकसंहिता [ अ० ८
रोगी की सब अवस्थाओं को बार-बार देखकर उचित रीति से औषध देने के
लिये करनी चाहिये । क्योकि समय के बीतने पर अथवा समय से पूर्व दी हुई
औषध फलदायक नहीं होती । उचित काल ही औषध प्रयोग को सफल
करता है ॥ १२८ ॥
प्रवृत्तिस्तु प्रतिकर्मसमारम्भः । तस्य लक्षणं-भिषगातुरौषधपरिचा-
रकाणां क्रियासमायोगः ॥ १२९ ॥
प्रवृत्ति—चिकित्सा कर्म का प्रारम्भ 'प्रवृत्ति' है। भिषग्, औषध रोगी और
परिचारक इन चारों का मिलकर क्रिया आरम्भ करना इसका लक्षण है ॥१२९॥
उपायः पुनभिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । तस्य
लक्षणं—भिषगादीनां यथोक्तगुण-संपद्देश-काल-प्रमाण-सात्म्य-क्रियादि-
भिश्च सिद्धिकारणैः सम्यगुपपादितस्यौषधस्यावचारणमिति ॥ १३० ॥
एवमेते दश परीक्ष्यविशेषाः पृथक्पृथक् परीक्ष्यितव्या भवन्ति ॥
उपाय—भिषग्, औषध, रोगी और परिचारक इन चारों का यथोक्त
उत्तम गुण वाला होना एवं देश काल की अपेक्षा से इनका एकत्र होना है ।
खुड्डाक-चतुष्पाद अध्याय में कहे अपने-अपने गुणों से युक्त होकर, देश, काल,
प्रमाण, सात्म्य और क्रिया आदि सफलता देने वाले कारणों से विचार कर भली
प्रकार दी हुई औषध का प्रयोग ही उपाय का लक्षण है ।
इस विधि से कारण आदि दस परीक्ष्य विषयों की पृथक् पृथक् परीक्षा
करनी चाहिये ॥ १३० ॥
परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानं । प्रतिपत्तिर्नाम—यो
विकारो यथा प्रतिपत्तव्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम् ॥ १३१ ॥
परीक्षा का प्रयोजन—परीक्षा का प्रयोजन 'प्रतिपत्ति' है अर्थात् जो विकार
जिस प्रकार से जानना चाहिये और जिस उपाय से चिकित्सा करना चाहिये,
उस रोग की वैसी चिकित्सा का ज्ञान करना 'प्रतिपत्ति' है ॥ १३१ ॥
यत्र तु खलु वमनादीनां प्रवृत्तिर्यत्र च निवृत्तिस्तद् व्यासतः सिद्धि-
षूत्तरकालमुपदेक्ष्यते सर्वम् । प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे तु खलु गुरु-
लाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम् । सन्ति हि व्याधयः
शास्त्रेषूत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः । तस्माद् गुरुलाघवं संप्रधार्य
सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम् ॥ १३२ ॥
जिन रोगियों को वमन देना चाहिये और जिनको वमन आदि नहीं देना
चाहिये, इन सबको पृथक् पृथक् आगे सिद्धिस्यान में कहेंगे ।