चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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पार्र्ष्णि-गुल्फ-जान्वरत्नि-जत्रु-चिबुक-शिरः-पर्व-स्थूलाः स्थूलास्थि-नख-
दन्ताश्चास्थिसाराः। ते महोत्साहाः क्रियावन्तः क्लेशसहाः सार-स्थिर-
शरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च ॥ १६८ ॥
अस्थिसार वाले पुरुषो में एड़ी, टखना, घुटना, कलाई, हंसली, चिबुक
( ठोड़ी ), शिर, पोरू ( पर्व ) मोटे होते हैं; नख, दांत और अस्थियां मोटी
होती हैं । अस्थिसार वाले मनुष्य बड़े उत्साह वाले, क्रियावान्, क्लेश सहने
वाले, सार के कारण स्थिर शरीर वाले और आयुष्मान् होते हैं ॥ १६८ ॥
तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूल-दीर्घ-वृत्त-संधयश्च मज्ज-
साराः। ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुत-वित्त-विज्ञानापत्य-संमान-भाजश्च
भवन्ति ॥ १६६ ॥
मज्जासारवाले पुरुष छोटे या मृदु अंगवाले बलवान्, स्निग्ध वर्ण और स्वर
वाले, स्थूल, लम्बी, गोल संधिवाले होते हैं । ये पुरुष दीर्घायु, बलवान्, श्रुत-
वान्, विज्ञानवान्, वित्तवान्, अपत्यवान् और संमानवान्, होते हैं ॥ १६६ ॥
सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्ध-
वृत्त-सार-समसंहत-शिखरि-दशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो
महास्फिचश्च शुक्रसाराः। ते स्त्रीप्रियाः प्रियोपभोगा बलवन्तः सुखैश्वर्या-
रोग्य-वित्त-संमानापत्य-भाजश्च भवन्ति॥ ११०॥
शुक्रसार वाले पुरुष सौम्यमूर्ति, सौम्य दृष्टि, देखने से ही तृप्त करने वाले,
दूध से पूर्ण आंख वाले, अत्यन्त कामोत्तेजना वाले, स्निग्ध वृत्त वाले, सार-
वान्, एक समान मिले अंगों और उन्नत दांतो वाले, प्रसन्नस्निग्ध वर्ण स्वर
वाले; दीप्तिमान्, बड़े नितम्ब प्रदेश वाले होते हैं। ये पुरुष स्त्रियों के प्रिय,
उपभोग को चाहने वाले, बलवान्, सुख, ऐश्वर्य, आरोग्यता, धन और संतान
वाले होते हैं ॥ ११० ॥
स्मृतिमन्तो भक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा
धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः स्ववस्थित गति-गम्भीर-बुद्धि-
चेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः। तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा
व्याख्याताः ॥ १११ ॥
सत्त्व ( ओज ) सार वाले पुरुष—स्मृतिमान्, भक्तिमान्, कृतज्ञ, प्राज्ञ,
शुचिस्वभाव, महोत्साही, दक्ष, धीर, लड़ाई में पराक्रम पूर्वक लड़ने वाले,
शोकरहित, सुव्यवस्थित गति वाले, गम्भीर बुद्धि एवं चेष्टादीक, शुभ कार्यों में
ध्यान लगाने वाले होते हैं। इनके लक्षणों से ही इनके गुण कह दिये हैं ॥ १११ ॥