चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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सार द्वारा परीक्षा करनी चाहिये—बल परिमाण को विशेष रूप से जानने
के लिये पुरुषों में आठ प्रकार के सारों का उपदेश किया है, जैसे—त्वग्, रक्त,
मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र और सत्त्व ॥१०३॥
तत्र स्निग्ध-श्लक्ष्ण-मृदु-प्रसन्न-सूक्ष्माल्प-गम्भीर-सुकुमार-लोमा सप्र-
भेव च त्वक् त्वक्साराणाम्। सा सारता सुख-सौभाग्यैश्वर्योपभोग-बुद्धि-
विद्यारोग्य -प्रहर्षणान्यायुष्यानित्वरमाचष्टे ॥ १०४॥
इनमें—त्वक् सार वाले पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, मृदु, प्रसन्न, सूक्ष्म,
अल्प, गम्भीर, कोमल लोमवाली और प्रभा (कान्ति) से युक्त होती है। इस
प्रकार की सारता, सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य,
प्रहर्ष और दीर्घ आयुष्य को बतलाती है ॥१०४॥
कर्णाक्षि-मुख-जिह्वा-नासोष्ठ-पाणि-पादतल-नख-ललाट-मेहनं स्निग्ध-
रक्तं श्रीमद् भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम्। सा सारता सुखमुद्दग्रतां मेधां मनस्वि-
त्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेशसहिष्णुत्वमुष्णासहिष्णुत्वं चाऽऽचष्टे १०५
रक्तसार वाले पुरुषों के कान, आंख, मुख, जिह्वा, नाक, ओष्ठ, हाथ, पांव
के तलुवे, नख, मस्तक, लिंग स्निग्ध और रक्त वर्ण के, शोभा और दीप्ति से
युक्त होते हैं। इस प्रकार की रक्त-सारता, व्यक्ति के सुख, विपुल बुद्धि, मन-
स्विंता, सुकुमारता, मध्यम बल, क्लेश न सहन करने का स्वभाव और गर्मी न
सह सकने की प्रकृति को बतलाती है ॥१०५॥
शङ्ख-ललाट-कृकाटिकाक्षि-गण्ड-हनु-ग्रीवा-स्कन्धोदर-कक्ष-वक्षः-पाणि-
पादसन्धयः गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणाम्। सा सारता क्षमां धृति-
मलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे ॥१०६॥
मांस-सार वाले पुरुषों में शंख (कनपटी), मस्तक, कृकाटिका (घाटा,
गलघेंटी), आंख, गण्डस्थल, ठोड़ी, ग्रीवा, स्कन्ध, पेट, कांख, छाती, पांव,
हाथ तथा सन्धियां-स्थिर, गुरु और मांस से भरी होती हैं। यह मांस-सारता
क्षमा, धृति, निर्लोभता, वित्त, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और
दीर्घ-आयु को बतलाती है ॥१०६॥
वर्ण-स्वर-नेत्र-केश-लोम-नख-दन्तोष्ठ-मूत्र-पुरीषेषु विशेषतः स्नेहो
मेदःसाराणाम्। सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारो-
पचारतां चाऽऽचष्टे ॥ १०७ ॥
मेदःसार वाले पुरुषों में—वर्ण, स्वर, नेत्र, केश, लोम, नख, दांत, ओठ,
मूत्र, पुरीष और विशेष कर स्नेह (चिकनाई) होता है। यह सारता वित्त,
ऐश्वर्य सुखकर उपभोग सरलता और सुकुमारता को बतलाती है ॥१०७॥