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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 607 of 639

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Page 607

[अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८६

कार्यं धातुसाम्यं, तस्य लक्षणं विकारोपशमः, परीक्षा त्वस्य रुगप-
शमनं स्वरवर्णयोगः शरीरोपचयः बलवृद्धिश्ञ्चाभ्यवहार्याभिलाषा रुचिरा-
हारकालेऽभ्यवहृतस्य चाऽऽहारस्य काले सम्यग्जरणं निद्रालाभो यथा-
कालं वैकारियाणां च स्वप्नानामदर्शनं सुखेन च प्रतिबोधनं वातमूत्र-
पुरीषरेतसां मुक्तिश्च सर्वाकारर्मनोबुद्धीन्द्रियाणां चाव्यापत्तिरिति ॥६१॥
कार्य—धातुओं का समान करना कार्य है। विकार का शान्त होना यह
इसका लक्षण है। इसकी परीक्षा दर्द का शान्त होना है। स्वर और वर्ण का
प्राकृत रूप में आजाना। शरीर की वृद्धि, बलवृद्धि, भोजन में इच्छा, आहार
के समय रुचि होना, खाये हुए भोजन का आहारकाल में भली प्रकार जीर्ण
होना, ठीक समय पर नींद आना, विकार (रोग) जन्य स्वप्नों का न देखना,
सुखपूर्वक जागना, प्रातः उठना, वायु, मूत्र, मल और शुक्र का ठीक समय
पर त्याग होना, सब प्रकार से मन, बुद्धि और इन्द्रियों में सुख होना ॥ ६१ ॥
कार्यफलं सुखावाप्तिः। तस्य लक्षणं मनोबुद्धीन्द्रियशरीरतुष्टिः ॥६२॥
कार्यफल—सुख का प्राप्त होना। इसका लक्षण-मन, बुद्धि, इन्द्रिय और
शरीर का प्रसन्न होना है ॥ ६२ ॥
अनुबन्धस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं प्राणैः सहः संयोगः ॥ ६३ ॥
अनुबन्ध—आयु है, इसका लक्षण-प्राणों के साथ शरीर का सम्बन्ध बना
रहना है ॥ ६३ ॥
देशस्तु भूमिरातुरश्च। तत्र भूमिपरीक्षा—आतुरपरिज्ञानहेतोर्वा
स्यादौषधपरिज्ञानहेतोर्वा। तत्र तावदियमातुरपरिज्ञानहेतोः। तद्यथा
कस्मिन्नयं भूमिदेशे जातः संवृद्धो व्याधितो वेति । तस्मिंश्च भूमिदेशे
मनुष्याणामिदमाहार जातमिदं बिहारजातमेतद्बलमेवंविधं सत्त्वमेवं-
विधं सात्म्यमेवंविधा दोषो भक्तिरियमिमे व्याधया हितमिदमहि-
तमिदामित (प्रायोग्रहणेन)। औषधपरिज्ञानहेतास्तु कल्पेषु भूमि-
परीक्षा वक्ष्यत ॥ ६४ ॥
देश—देश भूमि और रोगी हैं। इनमें भूमि-परीक्षा के ज्ञान का प्रयोजन
रोगी के देश के कारण सात्म्य को समझने के लिये और औषधि के ज्ञान के
लिये है। इनमें रोगी को समझने के लिये—जैसे-किस भूमि-खण्ड पर यह रोगी
उत्पन्न हुआ है? बढ़ा है ? रोगी हुआ है ? उस भूमि पर मनुष्यों का इस
प्रकार का अहार है, इस प्रकार का विहार है, इस प्रकार का आचार है, इस
प्रकार का बल, इस प्रकार का सत्त्व, इस प्रकार का सात्म्य, इस प्रकार के दोष,
इस प्रकार की रुचि, इस प्रकार के रोग, यह हितकर, यह अहितकर है, यह