चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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यथोक्ताः सिद्धयपायाश्चोपायाभिप्लुता इति। यत्त द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु
योगमुपैति; तस्यापीयं परीक्षा,-इदमेवंप्रकृत्या एवं गुणमेवं प्रभावमस्मि-
न्देशे जातमस्मिन्नृताववं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया मात्रया
युक्तमस्मिन् रोगे एवंविधस्य पुरुषस्यैतावन्तं दोषमपकर्षत्युपशमयति
वा यदन्यदपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति ॥ ८९ ॥
भेषज (औषध) करण है। धातुसाम्यरूप कार्य के करने में प्रयत्न करते
हुए वैद्य को जो वस्तु साधन होती हैं उसका नाम 'भेषज' है। यह
भेषज (औषध) आश्रय भेद से दो प्रकार की है। (१) दैवव्यपाश्रय और
(२) युक्तिव्यपाश्रय। इनमें दैवव्यपाश्रय मंत्र, औषधि, मणि, मंगल, बलि,
उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, दान, स्वस्त्ययन, प्रणिपात (विनय),
गमन आदि कार्य दैव का आश्रय करके धातुओं को समान करते हैं। युक्ति-
व्यपाश्रय—संशोधन, उपशमन और दृष्टफल वाली चेष्टाएं (धावन, स्वप्न,
जागरण आदि)। यही भेषज अंग भेद से दो प्रकार का है। (१) अद्रव्य
और (२) द्रव्य। इनमें जो अद्रव्य औषध है वह उपाय से व्याप्त है। भय
दिखाना, विस्मय उत्पन्न करना, झिड़कना, बांधना, नींद लाना, अंगमर्दन
आदि (दौड़ना, तैरना आदि) अमूर्त्त पदार्थों और चिकित्सा में सफ़लता देने
वाले भिषग् आदि गुणों का होना ये उपाय हैं और जो औषध द्रव्य रूप हैं
वह वमन आदि शोधन-शमन कार्यों में काम आते हैं। द्रव्य रूप (मूर्त्त)
ओषधि की ऐसी परीक्षा करनी उचित है कि इस औषधि की यह प्रकृति है,
यह गुण है, ऐसा प्रभाव है, इस देश में उत्पन्न हुई है, इस ऋतु में संग्रह की
गई है, इस प्रकार से रक्खी गई है, इस प्रकार के पुरुष को देने से इतने दोष
को बाहर करती है अथवा शमन करती है। अन्य भी जो औषध इन या अन्य
गुणों से युक्त थी, उसने भी दोषो का निष्कासन अथवा शमन किया था, इस-
लिये यह भी करेगी, इस प्रकार अन्यत्र प्रत्यक्ष करके यहां पर अनुमान से निश्चय
करना चाहिये ॥ ८६ ॥
कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, तस्य लक्षणं विकारागमः, परीक्षा त्वस्य
विकारप्रकृतेश्चैवोनातिरिक्तलिङ्गविशेषावेक्षणं विकारस्य च साध्यासा-
ध्य-मृदु-दारुण-लिङ्ग विशेषावेक्षणमिति ॥ ९० ॥
कार्ययोनि—धातुओं की विषमता 'कार्ययोनि' है। विकार का होना यह
उसका लक्षण है। इस विकार की प्रकृति के वातादि दोषों के कम अधिक,
विशेष लक्षणों को देखना। इसी प्रकार से विकार का साध्य, असाध्य, मृदु,
दारुण आदि विशेष लक्षणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ९० ॥