चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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न्यून—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक से
भी न्यून हो तो वह न्यून दोष गिना जाता है। अथवा जो वस्तु बहुत से हेतु
देकर सिद्ध करनी चाहिये, उस वस्तु को केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाये
तो वह भी 'न्यून' दोष समझना चाहिये।
अथाधिकं—अधिकं नाम यदायुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशन-
समन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते । यद्वा पुनः प्रतिसंबद्धार्थमपि
द्विरभिधीयते तत्पुनरुक्तत्वादधिकम् । तच्च पुनरुक्तं, द्विविधम् । अर्थ-
पुनरुक्तं शब्दपुनरुक्तं च । तत्रार्थपुनरुक्तं नाम यथा—भेषजमौषधं
साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं नाम पुनः भेषजं भेषजमिति ।
अधिक-न्यून से विपरीत हेतु आदि उदाहरण अधिक हों उसको अधिक
कहते हैं। अथवा आयुर्वेद के विषय में बार्हस्पत्य, औशनस आदि अन्य
अप्रासंगिक बातों का कहना, अथवा प्राकृत ( सम्बन्धित ) वस्तु को दो बार
कहना यह भी पुनरुक्त होने से 'अधिक' ही होता है। यह पुनरुक्त दो प्रकार
का है । जैसे—अर्थपुनरुक्त और शब्दपुनरुक्त । इनमें 'अर्थपुनरुक्त' दो प्रकार
का है । जैसे—भेषज, औषध और साधन । 'शब्दपुनरुक्त' जैसे 'भेषज
भेषज' है।
अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात्पञ्चवर्गवन्न चार्थतः
गृह्यते ।
अनर्थक— जिनका कहना पंचवर्ग ( ङ ञ ण न म ) के समान केवल
अक्षर समूह ( वर्णमाला ) के रूप में होता है, जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता
उसका नाम 'अनर्थक' है।
अथापार्थकं—अपार्थकं नाम यदर्थवच्च परस्परेण चायुज्यमानार्थ-
कम् । यथा—चक्र-नक्र-वंश-वज्र-निशाकरा इति ।
अपार्थक—जब बहुतोंमें से प्रत्येक शब्द अर्थ वाला होकर भी वे सब पर-
स्पर मिलकर किसी भी अर्थ को न बता सकें तब 'अपार्थक' दोष होता है ।
जैसे—चक्र, नक्र, वंश, वज्र, निशाकर आदि । इनमें से प्रत्येक का पृथक् २
अर्थ है, परन्तु मिलने पर कोई संगत अर्थ नहीं निकलता ।
विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्तसमयैर्विरुद्धं, तत्र दृष्टान्तसिद्धान्ता-
वुक्तौ,समयः पुनस्त्रिधा भवति, यथा—आयुर्वेदिकसमयो याज्ञिकसमयो
मोक्षशाब्दिकसमय इति । तत्रायुर्वेदिक्समयश्चतुष्पादं भेषजमिति,याज्ञि-
कसमयः, आलब्ध्याः पशव इति,सर्वभूतेष्वहिंसेति मोक्षशाब्दिकसमयः ।
तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवतीति वाक्यदोषः ॥ ५४ ॥