चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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यथा-संशोधनसाध्योऽयं व्याधिरित्युक्ते किं वमनसाध्यः किं वा
विरेचनसाध्यः ? इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥
अनुयोज्य-जो वाक्य वाक्य के न्यून आदि दोषों से युक्त होता है, उसका
नाम अनुयोज्य है। क्योंकि इस प्रकार का दोषयुक्त वाक्य प्रयुक्त नहीं किया
जा सकता । अथवा सामान्य रूप में कहे हुए वाक्यार्थ में विशेष ग्रहण के लिये
जो वाक्य कहा जाता है, वह भी अनुयोज्य होता है। यथा-यह रोग संशोधन
से साध्य है, ऐसा कहने पर वमनसाध्य है या विरेचनसाध्य है। यह और भी
वक्तव्य शेष रह जाने से 'अनुयोज्य' है ॥ ५० ॥
अथाननुयोज्यं—अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा—अयम-
साध्यः ॥ ५१ ॥
अननुयोज्य — अनुयोज्य के विपरीत-वाक्यदोष से रहित वचन को 'अननु-
योज्य' कहते हैं। यथा- यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥
अथानुयोगः- अनुयोगो नाम यत्तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे
तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-परी-
क्षार्थमादिश्यते । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञाते, यत्परः को हेतुरि-
त्याह सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥
अनुयोग—विशेष विद्या वाले पुरुष का उसी (एक समान) विद्या वाले
पुरुष के साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रतिवचन शक्ति की परीक्षा के लिये सम्पूर्ण उसी
शास्त्र में अथवा उस शास्त्र के किसी एक भाग में प्रश्न करना 'अनुयोग' कहाता
है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है। दूसरे ने पूछा—इसमें हेतु
क्या है ? यह कहना अनुयोग है ॥ ५२ ॥
अथ प्रत्यनुयोगः -प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा—
अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति ॥ ५३ ॥
प्रत्यनुयोग—अनुयोग का अनुयोग करना प्रत्यनुयोग है। जैसे—एक ने
प्रतिज्ञा की-पुरुष नित्य है, दूसरे ने प्रश्न किया इसमें क्या हेतु है? इस हेतु में
क्या हेतु है ? ऐसा प्रश्न पर प्रश्न पूछना 'प्रत्यनुयोग है ॥ ५३ ॥
अथ वाक्यदोषः —वाक्यदोषो नाम यथा —खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम-
धिकमनर्थकमपार्थकं विरुद्धं चेति । तत्र प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनि-
गमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवतीति, बहुद्दिष्टहेतुकमेकेन
साध्यते हेतुना तच्च न्यूनम्, एतानि ह्यन्तरेण प्रकृतोऽप्यर्थः प्रनश्येत् ।
वाक्यदोष—वाक्य में विषय की दृष्टि से निम्न दोष होते हैं जैसे—न्यून,
अधिक, अनर्थक, अपार्थक और विरुद्धार्थ।