चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextस्निग्ध भोजन करे। स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है। खाने पर
निर्बल जाठराग्नि को बढ़ाता है। शीघ्र परिपाक होता है। वायु का अनुलोमन
करता है, शरीर को बढ़ाता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, शरीर में बलकी
वृद्धि करता है, रंग में कान्ति, चिकनाई उत्पन्न करता है, इसलिये स्निग्ध
भोजन करे ॥ ३२ ॥
मात्रावदश्नीयात् । मात्रावद्धि भुक्तं वात-पित्त-कफानप्रपीडयदायुरेव
विवर्धयति केवलं, सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यथं
च परिपाकमेति, तस्मान्मात्रावदश्नीयात् ॥ ३३ ॥
मात्रा में खावे। मात्रा में खाया हुआ अन्न वात, पित्त और कफ को कुपित
नहीं करता, केवल आयु को ही बढ़ाता है। परिपाक होकर सुखपूर्वक गुदा
मार्ग से बाहर निकल आता है। शरीर की अन्तराग्नि को नहीं बिगाड़ता, बिना
कष्ट के परिपाक हो जाता है, इसलिये मात्रा में भोजन करे ॥ ३३ ॥
जीर्णेऽश्नीयात् । अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजातं
पूर्वस्याऽऽहारस्य रसमपरिणतमुत्तरेणाऽऽहाररसेनोपसृजत् सर्वान्दो-
षान् प्रकोपयत्याशु, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थानस्थेषु दोषेष्वग्नौ चोदीर्णे,
जातायां च बुभुक्षायां, विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु, चोद्गारे विशुद्धे,
विशुद्धे च हृदये, वातानुलोम्ये, विसृष्टेषु च वात-मूत्र-पुरीष-वेगेष्वभ्य-
वहृतमाहारजातं सर्वशरीरधातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलम्,
तस्माज्जीर्णेऽश्नीयात् ॥ ३४ ॥
पूर्व-भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर खावे। अजीर्ण अवस्था में भोजन
करने से पूर्व में खाये हुए भोजन के अपरिपक्व रस से नवीन आहार का रस
मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर देता है। इसलिये पूर्व भुक्त भोजन के
जीर्ण होने पर, दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के उदीप्त होने
पर, भूख लगने पर, अन्नवह स्रोतों के मुखों के खुल जाने पर, डकार के
विशुद्ध होने पर, हृदय ( आमाशय ) के साफ होने पर, वायु के अनुकूल होने
पर वायु, मूत्र, मल के वेगों के साफ होने पर किया हुआ भोजन शरीर के सब
धातुओं को समान अवस्था में रखता हुआ, केवल आयु को ही बढ़ाता है, इस
लिये जीर्ण अवस्था में भोजन करे ॥ ३४ ॥
वीर्याविरुद्धमश्नीयात् । अविरुद्धवीर्यमश्नन् हि न विरुद्ध-
जैर्विकारैरुपसृज्यते, तस्माद्वीर्याविरुद्धमश्नीयात् ॥ ३५ ॥
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे। अविरुद्ध