चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished639 pages
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अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
इस प्रकार से आहार विधि के विशेष आठ आयतन कह दिये हैं। ये
प्रकृति आदि आठों आयतन शुभ और अशुभ फल (स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य)
को उत्पन्न करने में परस्पर एक दूसरे के सहायक होते हैं। इस लिये वैद्य
इन को भी जाने। इन में जो सम-धातुओं को प्रकृति में रक्खें और विषम
धातुओं को समान करें उन को जानकर हितकारक का सेवन करे। मोह,
अज्ञान अथवा लापरवाही से आपातप्रिय (सेवन के समय अतिप्रिय), परन्तु
उत्तरकाल में परिणाम में दुःख विकार वा रोगकारक अहित आहार पदार्थों या
अन्य इस प्रकार के विहार का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्रेद्माहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां च केषाञ्चित्काले प्रकृ-
त्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जीर्णे वीर्या-
विरुद्धमिष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नातिविलम्बितमजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीताऽऽत्मानमभिसमीक्ष्य सम्यक् ॥ ३० ॥
यहां आगे कही जाने वाली आहार विधि स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिये
उचित समय में स्वभाव से हितकारक होती है।
आहार विधि-उष्ण (गरम) भोजन खावे, स्निग्ध भोजन करे, मात्रानु-
सार खाये, पूर्व भोजन के जीर्ण होने पर खाये, अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को
खाये, मनोवाञ्छित स्थान पर, मन के अनुकूल उपकरणों के साथ, न बहुत
जल्दी, न बहुत धीरे, बिना बोले, बिना हँसे, पूर्ण मन देकर, आत्मा के सात्म्य
या अपनी शक्ति को देखकर भली भांति विचार कर खाये ॥ ३० ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः-उष्णमश्नीयात् । उष्णं हि भुज्यमानं
स्वदते, भुक्तं चाग्निमौदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं च जरां गच्छति, वातं
चानुलोमयति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, तस्मादुष्णमश्नीयात् ॥३१॥
इस प्रकार भोजन करने के सद्गुणों का उपदेश करते हैं-गरम, जितना-
गरम मुख में सहन हो सके, उतना गरम भोजन करे। गरम भोजन रुचि उत्पन्न
करता है, खाने में अच्छा लगता है। खाने पर जाकर अग्नि को बढ़ाता है,
शीघ्र पाचन हो जाता है। वायु का अनुलोमन करता है, कफ को सुखाता है।
इस लिये गरम भोजन खावे ॥ ३१ ॥
स्निग्धमश्नीयात् । स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, युक्तमौदर्यमग्नि-
न्ति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, दृढीकरोति शरीरो-
पचाभिवृद्धिं चाभिजमयति, वर्णप्रसादमपि चाभिनिर्वर्तयति
यात् ॥ ३२ ॥