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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 489 of 639

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Page 489

अ० ७ ] निदानस्थानम् ४७१
साध्यं तु साध्यसंयोगं, तस्य साधनं साधनसंयोगमेव विद्यादिति ॥१६॥
उन्माद के भेद—ऊपर कहे हुए पांच उन्माद निज और आगन्तुज भेदसे
या साध्य और असाध्य भेद से, पांच प्रकार के होने पर भी दो प्रकार के
होते हैं। कई बार निज दोषजन्य उन्माद के साथ आगन्तुज उन्माद भी पर-
स्पर अनुबन्ध रूप से मिला होता है और कभी साध्य और असाध्य दोनों प्रकारके
उन्मादों के कारणों का संयोग होता है, इस अवस्था में पूर्वरूप और लक्षण दोनों
मिश्रित होते हैं। दोनों प्रकार के लक्षणों के मिलने से रोग असाध्य हो जाता है।
इस में भी असाध्य संयोग अथवा साध्य और असाध्य दोनों का संयोग हो तो
इसको असाध्य जाने। साध्य लक्षणों का संयोग हो तो साध्य जाने। (अर्थात् मिश्रित
लक्षणों वाले उन्माद में संयुक्त औषधियों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये) ॥१६॥
भवन्ति चात्र—नैव देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ।
न चान्ये स्वयमक्लिष्टमुपक्लिश्यन्ति मानवम् ॥ २० ॥
ये त्वेनमनुवर्तन्ते क्लिश्यमानं स्वकर्मणा ।
न तन्निमित्तः क्लेशोऽसौ न ह्यस्ति कृतकृत्यता ॥ २१ ॥
प्रज्ञापराधात्संप्राप्ते व्याधौ कर्मज आत्मनः ।
नाभिशंसेद् बुधो देवान्न पितॄनापि राक्षसान् ॥ २२ ॥
आत्मानमेव मन्येत कर्तारं सुखदुःखयोः ।
तस्माच्छ्रेयस्करं मार्गं प्रतिपद्येत नो त्रसेत् ॥ २३ ॥
देवादीनामपचितिर्हितानां चोपसेवनम् ।
ते च तेभ्यो विरोधश्च सर्वमायत्तमात्मनि ॥ २४ ॥
जो मनुष्य स्वयं अपने दोषों से पीड़ित नहीं होता उसको न तो देवता, न
गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस और न अन्य योनियां क्लेशित करती हैं। अपने
कर्मों के कारण देवता आदि द्वारा जो पीड़ा मिलती है; उसका कारण देवता
नहीं होते। क्योंकि अशुभ कर्मों के फल स्वरूप उन्माद होता है। इन कर्मों के
कर्त्ता देवता आदि नहीं हैं। बुद्धि के अपराध से अपने कर्मों के दोष से
रोग उत्पन्न होते हैं, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि देवता, पितर या
राक्षस आदि को दोष न दे, उनको उपालम्भ न दे। अपने को ही सुख और
दुःख का कारण माने। इसलिये मनुष्य देव आदि से भय न कर के श्रेयस्कर
मार्ग का अनुसरण करे। देव आदि की पूजा, हितकारक पदार्थों का सेवन
...गण से विरोध करना, ये सब बातें अपने हाथ में हैं ॥२०-२४॥
...—संख्या निमित्तं द्विविधं लक्षणं साध्यतां न च ।