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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 488 of 639

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Page 488

४७० चरकसंहिता [ अ० ७
आरम्भ करने से उन्माद रोग का आक्रमण होता है। इस प्रकार से आघात
काल का वर्णन कर दिया है ॥ १६ ॥
त्रिविधं तु खलून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति ।
तद्यथा—हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति । तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचा-
रविशेषलक्षणैर्विद्यात् । तत्र हिंसार्थमुन्माद्यमानोऽग्निं प्रविशत्यप्सु वा
निमज्जति, स्थलाच्छ्वभ्रे वा निपतति, शस्त्र-कशा-काष्ठ-लोष्ट-मुष्टिभिर्ह-
न्त्यात्मानमन्यच्च प्राणवधार्थमारभते किंचित्, तमसाध्यं विद्यात्,
साध्यौ पुनर्द्वावितरौ ॥ १७ ॥
उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन—उन्माद रोग को उत्पन्न करने वाले
भूतों के मनुष्यों को उन्मत्त बनाने में तीन प्रकार के प्रयोजन हैं । यथा—हिंसा,
रति और पूजा । इन कार्यों (प्रयोजनों) को उन्मत्त पुरुष के लक्षणों से
पहिचानना चाहिये । हिंसा के लिये उन्माद होने पर मनुष्य आग में घुसता है,
पानी में डूबता है, ऊंचे स्थान से गड्ढे में गिरता है, हथियार, काष्ठ, कशा,
(चाबुक), ढेला (पत्थर), मुक्कों आदि से अपने को मारता है, अथवा अन्य
इसी प्रकार के प्राणनाश करने वाले कार्यों को करता है। इसको असाध्य
जानना चाहिये । १बाकी के दोनों प्रकार के उन्माद साध्य हैं ॥ १७ ॥
तयोः साधनानि-मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नियम-
व्रत-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात-गमनादीनीति । एवमेते पञ्चो-
न्मादा व्याख्याता भवन्ति ॥ १८ ॥
ये उन्माद मन्त्र, औषधि, मार्ग, मंगल-पाठ, बलिदान, उपहार, हवन,
नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात आदि मंगल कृत्यों से
शान्त होते हैं । इस प्रकार से पांचों उन्मादों की व्याख्या करदी ॥ १८ ॥
ते तु खलु निजागन्तुविशेषेण साध्यासाध्यविशेषेण च प्रविभज्य-
मानाः पञ्च सन्तो द्वावेव भवतः । तौ परस्परमनुबध्नीतः । कदाचिद्य-
थोक्तहेतुसंसर्गादुभयोः संसृष्टमेव पूर्वरूपं भवति, संसृष्टञ्चैव लिङ्गमभि-
ज्ञेयम् । तत्रासाध्यसंयोगं साध्यासाध्यसंयोगं वाऽसाध्यं विद्यात् ।
१. रति प्रयोजन से आक्रान्त होने पर मनुष्य खेलता है, पूजा के लिये
पूजा करता है। देव आदि मनुष्य को आक्रान्त नहीं करते । जैसा कि सुश्रुतमें
कहा है—
"न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान क्वचिदाविशन्ति ।
ये त्वाविशन्ति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोहाः ॥"