चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ६ ] निदानस्थानम ४५७
च्छोपहन्ति, कासं श्वासं ज्वरं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति । ततः
सोऽप्युपशोषणैरेतै रुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो
मतिमानात्मनः शरीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत । शरीरं ह्यस्य मूलं,
शरीरमूलश्च पुरुषो भवतीति ॥ ६ ॥
भवति चात्र—सर्वमन्यत्परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ।
तद्भावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥ इति ॥
( २ ) वेग सन्धारण मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना शोष का
कारण है, यह जो कहा है उसकी व्याख्या करते हैं—
जिस समय पुरुष राजा के समीप, स्वामी के समीप, गुरु की चरणसेवा में,
जुआखाने मे, अथवा इसी प्रकार दूसरे सज्जन मनुष्यों की सभा में, या स्त्रियों के
बीच में घुसकर, या ऊंची-नीची सवारी पर यात्रा करते समय, भय से, प्रसंग से,
लज्जा से वा घृणा से वायु मूत्र या मल के उपस्थित वेगों को रोक लेता है, तब
उनके रोकने से वायु प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित हुआ वायु, पित्त और
कफ को कुपित करके ऊपर-नीचे या तिरछे रूप में बहता है और तब किसी
भाग से शरीर के अवयव विशेष में प्रवेश करके पूर्व की भांति शूल उत्पन्न करता
है, मल का भेदन अथवा शोषण करता है । रोगी के पार्श्वों में पीड़ा उत्पन्न
करता है, कन्धों को तोड़ सा डालता है, (कन्धों का आकार बोतल की गर्दन
के समान हो जाता है, समकोण नहीं रहता ), कण्ठ और छाती पीड़ित होते हैं,
शिर में वेदना होती है । कास, श्वास, ज्वर, स्वरभेद, प्रतिश्याय रोग उत्पन्न
हो जाते हैं । रोगी भी इन शोषण करनेवाले उपद्रवों से धीरे-धीरे सूखने लगता
है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपना शरीर जिस प्रकार से सुखी,
स्वस्थ रहे, उस प्रकार का विशेष रूप से प्रयत्न करे, क्योंकि जो भी कोई
अमूल्य अलभ्य वस्तु है वह शरीर से ही होती है और पुरुष का शरीर ही
आधार है ।
इसलिये और सब कुछ छोड़कर शरीर को रक्षा करनी चाहिये । शरीर के न
रहने पर सब वस्तुओं का होना या न होना एक समान है । शरीर के होने पर
ही और सब पदार्थ उपयोगी होते हैं ॥ ६-७ ॥
क्षयः शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः—यदा पुरु-
। शोक-चिन्ता-परीत-हृदयो भवति, ईर्ष्योत्कण्ठा-भय-क्रोधा-
ते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बल-
हारोऽल्पाहारो वाऽऽस्ते, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः क्षयमु-