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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 435 of 639

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Page 435

अ० १] २७ निदानस्थानम् ४१७

तत्र यथोक्तानां ज्वरलिङ्गानां मिश्रीभावविशेषदर्शनाद् द्वन्द्विक-
मन्यतमं ज्वरं सान्निपातिकं वा विद्यात् ॥ १३ ॥
संसर्गज व सान्निपातिक ज्वर—इस प्रकार से दो दोष या तीन दोष साथ
मिलकर अनुक्रम से-कफ-वातज, कफ-पित्तज और कफ-वात-पित्तज ज्वर को
उत्पन्न करते हैं। द्वन्द्वज ज्वर में दो दोष कुपित होकर दोनों दोषों के
लक्षण उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार तीनों दोषों से उत्पन्न ज्वर में तीनों दोषों
के लक्षण होते हैं। इन लक्षणों को देखकर दो या तीन दोषों से उत्पन्न ज्वरों
को जानना चाहिये ॥ १३ ॥
अभिघाताभिषङ्गाभिचाराभिशापेभ्य आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो ज्व-
रोऽष्टमो भवति ।
आगन्तुज ज्वर—अभिघात (चोट आदि के लगना ), अभिषंग (काम
आदि वेग ), अभिचार ( अथर्वमन्त्र आदि से ज्वर पैदा करना ), अभिशाप
( गुरु, सिद्ध आदि पुरुषों का शाप ), इन मुख्य चार कारणों से व्यथापूर्वक
आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होता है। यह ज्वर आठवां प्रकार का है।
स किंचित्कालमागन्तुः केवलॊ भूत्वा पश्चाद् दोषैरनुबध्यते ।
तत्राभिघातजो वायुना दुष्टशोणिताधिष्ठानेन, अभिषङ्गः पुनर्व्वातपि-
त्ताभ्यां, अभिचाराभिशापजौ तु सन्निपातेनानुबध्येते । स सप्तविधाज्ज्व-
राद्विशिष्टलिङ्गोपक्रमसमुत्थानत्वाद्विशिष्टो वेदितव्यः, कर्मणा साधारणेन
चोपकर्म्यत इत्यष्टविधा ज्वरप्रकृतिरुक्ता ॥ १४ ॥
आगन्तुज ज्वर की सम्प्राप्ति—आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होकर कुछ काल
( सात दिन वा तीन दिन ) तक रहता है, फिर वात आदि दोष के साथ मिल
जाता है। अभिघातज ज्वर में प्रथम चोट आदि से ज्वर उत्पन्न होता है,
पीछे से दोष उत्पन्न होता है। इस ज्वर में वायु दूषित रक्त के साथ मिलकर
इसका आश्रय करके रहता है। अभिसंगज ज्वर वात-पित्त का आश्रय करता
है। अभिचार और अभिशाप से उत्पन्न ज्वर तीनों दोषों का आश्रय करके
रहते हैं। आगन्तुज ज्वर के लक्षण, चिकित्सा और इसका निदान, दूसरे
वात आदि दोषों से उत्पन्न सात प्रकार के ज्वर से सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं,
अर्थात् दैवव्यपाश्रय बलि मंगल आदि तथा युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा करनी
चाहिये। इसका साधारण कर्म, सब प्रकार के ज्वरों में सामान्यतः एक ही

१. 'व्यथापूर्वः' आगन्तुज ज्वर में व्यथा ही पूर्वरूप है। इन में प्रथम
ज्वर होकर फिर दोषों का सम्बन्ध होता है।