Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 434 of 639

Read in context
Page 434

४१६ चरकसंहिता [ अ० १
मिलाषः, श्लेष्मप्रसेको, मुखस्य च माधुर्यं, हृल्लासो, हृदयोपलेपस्ति-
मितत्वं, छर्दिर्मेन्दूग्निता, निद्राधिक्यं, स्तम्भस्तन्द्रा, श्वासः, कासः,
प्रतिश्यायः, शैत्यं, शैत्यं च नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थं, शीत-
पिडकाश्च भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोक्तानाम-
नुपशयो विपरीतोपशयश्चेति श्लेष्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ १२ ॥
कफज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में ज्वर एक साथ आता है, या
बढ़ता है। भोजन करने के समय (या खा चुकने पर ही) पूर्वाह्न में, रात्रि
के प्रथम भाग में, या वसन्त ऋतु में ज्वर का वेग बढ़ा होता है ↓ शरीर में
भारीपन, भोजन में अरुचि, मुख से लार बहना, मुख में मिठास, वमन की
रुचि, बेचैनी, हृदय का रुकना, हृदय (आमाशय) प्रदेश पर कफ का लगा
रहना, आलस्य (तन्द्रा), वमन, अग्नि का मन्द होना, नींद का अधिक आना,
जड़ता सुस्ती, खांसी, श्वास, जुकाम, शीत लगना, नख, आंख, मुख, मूत्र, मल
और त्वचा में सफेदी; शरीर पर बहुतसी पिडिकाओं, फुन्सियों का निकल
आना, इन पिडकाओं का स्पर्श शीतल होता है। उष्ण पदार्थों की चाह
रहती है, कफज्वर के कारण वाले पदार्थों का अनुकूल न आना और विपरीत
गुण वाले पदार्थों का अनुकूल आना होता है। ये कफज्वर के लक्षण हैं ॥१२॥
विषमाशनादनशनादन्नपरिवर्त्तादृतुव्यापत्तेरसात्म्यगन्धोपघ्राणाद्
विषोपहतस्योदकस्य चोपयोगाद् गरेभ्यो गिरीणां चोपश्लेषात् स्नेह-स्वेद-
वमन-विरेचनाऽऽस्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगात् मि-
थ्यासंसर्जनाद्वा स्त्रीणां च विषमप्रजननात् प्रजातानां च मिथ्योपचाराद्य-
थोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथानिदानं द्वन्द्वनामन्यतमः सर्वे वा
त्रयो दोषा युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तयैवाऽऽनुपूर्व्या ज्वरम-
भिनिर्वर्तयन्ति ।
तीन दोषों के प्रकोप के कारण ज्वर—विषम भोजन से, भोजन के न करने
से, ऋतु के बदलने से, ऋतु के विकृत (अतियोग, मिथ्यायोग) होने से; प्रति-
कूल-गंधयुक्त पदार्थों के सूंघने से; विषयुक्त पानी के उपयोग से; संयोगजन्य
विष के दोष से; पर्वतों के पास में रहने से; स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन,
आस्थापन, अनुवासन, और शिरोविरेचन के अयोग्य प्रयोग से स्त्रियों के विषम
प्रसव करने से; बालक की उत्पत्ति के पीछे मिथ्या परिचर्या से; और पूर्व कहे
हुए वात, पित्त, कफ इन दोषों के परस्पर मिश्रण से दो दोष या तीनों दोष एक
साथ प्रकुपित हो जाते हैं। औषधिकी गन्ध से ज्वर होता है—यथा "हाई फीवर"।