चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०९
यथा पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्यचित्रकौ।
एवमादीनि चान्यानि निर्दिशेद्रसतो भिषक् ॥ ४४ ॥
इसमें श्लोक हैं—रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य—जो द्रव्य रस और विपाक
में मधुर हो, उस को शीतवीर्य समझना चाहिये, और जो द्रव्य रस और पाक में
अम्ल हो, उस को उष्णवीर्य, जो द्रव्य रस और पाक में कटु हो, उस को भी
उष्णवीर्य समझना चाहिये। जो द्रव्य वीर्य और विपाक में विरोधी न
हों—एक समान हों, उनके गुणों का ज्ञान रस से ही करना चाहिये।
परन्तु इस का अपवाद भी है। जहां पर रस समान हैं, वहां पर विपाक द्वारा
गुणों का ज्ञान होता है। जिस प्रकार कि दूध और घी मधुर रस और मधुर
विपाक हैं, इन का वीर्य भी शीत है, इसी प्रकार चव्य और चित्रक इन का
रस और विपाक कटु हैं, इसलिये वीर्य भी इन का 'उष्ण' है। इस प्रकार से
अन्य द्रव्यों को भी रसनिर्देश से वैद्य सुगमता से समझ सकता है। क्योंकि रस
के अनुसार गुण हैं ॥ ४२-४४ ॥
मधुरं किंचिदुष्णं स्यात्कषायं तिक्तमेव च।
यथा महत्पञ्चमूलं यथा चानूपमामिषम् ॥ ४५ ॥
लवणं सैन्धवं नोष्णमम्लमामलकं तथा।
अर्कागुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते ॥ ४६ ॥
किंचिदम्लं हि संग्राहि किंचिदम्लं भिनत्ति च।
यथा कपित्थं संग्राहि, भेदि चामलकं तथा ॥ ४७ ॥
पिप्पली नागरं वृष्यं कटु चावृष्यमुच्यते ।
कषायः स्तम्भनः शीतः सोऽभयायामतोऽन्यथा ॥४८॥
तस्माद्रसोपदेशेन न सर्वं द्रव्यमादिशेत् ।
दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम् ॥ ४९ ॥
कभी कभी मधुर, कषाय और तिक्त रस भी उष्णवीर्य हो जाते हैं। यथा—
बिल्वादि महापञ्चमूल तिक्त और कषाय होने पर भी उष्ण वीर्य हैं, और जल-
चर या जलदेशीय मांस मधुर होने पर भी उष्ण है। सैन्धव नमक उष्णवीर्य
नहीं और आंवला खट्टा होने पर भी उष्णवीर्य नहीं है। आकड़ा, अगरू और
गिलोय ये तिक्त रस होने पर भी 'उष्ण' वीर्य हैं। अम्ल-रस में कोई द्रव्य
ग्राहक और कोई रेचक हैं। जिस प्रकार की कैथ अम्ल होने पर संग्राहक और
आंवला अम्ल होने पर भी रेचक है। पिप्पली और सोंठ कटु रस होने पर भी