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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 326 of 639

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Page 326

३०८ चरकसंहिता [ अ० २६
स्तम्भनः श्लेष्म-पित्त-रक्त-प्रशमनः शरीरक्लेदस्योपयोक्ता, रूक्षः शीतो
गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोषयति,
हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यवबध्नाति,
श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्र-
पुरीषाण्यवगृह्णाति, कर्षयति, ग्लापयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खर-
विशद-रूक्षत्वात्पक्ष-वध-महापतानकार्दित-प्रभृतींश्च वातविकारानुपन-
नयतीति ॥ ( ६ ) ॥
कषाय रस संशमन करने वाला, संग्राहक, सन्धारक, व्रण का पीड़न करने
वाला, रोपण, व्रण को शुष्क करने वाला, स्तम्भन, कफ, रक्त, पित्तनाशक,
शरीर में क्लेद को चूसने वाला, रूक्ष, शीत और गुरु है। यही रस अधिक
मात्रा में उपयोग करने से मुख को सुखा देता है, हृदय को पीड़ित करता है,
उदर में वायु से फुलाव उत्पन्न करता है, वाणी को जड़ कर देता है, स्रोतों को
बन्द कर देता है, कृष्णता उत्पन्न करता है, पुरुषत्व को नष्ट करता है, अन्न
को अवरोध करके पचन कराता है, वात, मूत्र, मल, रेतस् (शुक्र) को बन्द
कर देता है, रोक देता है, शरीर को कर्षण करता है, म्लान कर (मुरझा)
देता है, प्यास लगाता है, जकड़ देता है। खर, विशद और रूक्ष होने से
पक्षवध, हनुग्रह, मन्याग्रह, पृष्ठग्रह, अपतानक, अर्दित आदि वात रोगों को
उत्पन्न करता है ॥ ( ६ ) ॥
एवमेते षड् रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना
उपकारकरा भवन्त्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथोपयुज्य-
मानाः । तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति ॥ ४१ ॥
इस प्रकार से ये छः रस पृथक् पृथक् या दो या तीन अथवा सब परस्पर,
मिलकर मात्रा में योग्य प्रमाण से सेवन करने से सर्व प्राणिमात्र को आरोग्य
पुष्टि देकर उपकार करते हैं और असम्यक् रूप में उपयोग करने से सब प्राणियों
का अपकार करते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि इन को मात्रा
में सम्यक् प्रकार से बरतें ॥ ४१ ॥
भवन्ति चात्र—शीतं वीर्येण यद् द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः ।
तयोरम्लं यदुष्णं च यच्चोष्णं कटुकं तयोः ॥ ४२ ॥
तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः ।
वीर्यतोऽविपरीतानां पाकस्तश्चोपदेक्ष्यते ॥ ४३.॥