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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 324 of 639

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Page 324

३०६ चरकसंहिता [ अ० २६
करता है, शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है, आहार में रुचि उत्पन्न
करता है, आहार में सदा बरता जाता है, बहुत भारी नहीं होता, स्निग्ध और
उष्ण गुणवाला है।
यही एक रस यदि अधिक सेवन किया जाय तो पित्त को कुपित करता है,
रक्त को बढ़ाता है, प्यास उत्पन्न करता है, संज्ञा नाश करता है, शरीर को
गरम करता है, फाड़ता है, मांस को गलाता है, कुष्ठों को द्रवित करता है,
विष को बढ़ाता है, सूजन को फाड़ता है, दांतों को गिरा देता है, पुरुषत्व का
नाश करता है, इन्द्रियों को जड़ बनाता है। झुर्रियां पैदा करता, बालों को श्वेत
करता, गंज अर्थात् बालों को गिराता है। इसके अतिरिक्त रक्तपित्त, अम्लपित्त,
वीसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥(३)॥
कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्निं दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राण-
मास्रावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक-श्वयथूप-
चयोदर्दाभिष्यन्द-स्नेह-स्वेद-क्लेद-मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं कण्डूर्विनाश-
यति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्धां-
श्छिनत्ति, मार्गान्विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । स
एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति,
रसवीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति,
नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति,
बलं क्षिणोति, तृष्णां चोपजनयति । अपिच वाय्वग्निबाहुल्याद् भ्रम-म-
द-द्रवथु¹ कम्प-तोद भेदंश्चरण-भुज-पार्श्वपृष्ठ-प्रभृतिषु मारुतजान्विका-
रानुपजनयति ॥ (४) ॥
कटु रस मुख का शोधन करता है, अग्नि को बढ़ाता है, खाये हुए भोजन
को सुखाता है, नाक से कफ बहाता है, आंखों में आंसू लाता है, इन्द्रियों को
उत्तेजित करता है, अलसक, सूजन, वृद्धि, उदर्द, अभिष्यन्द, स्नेह, पसीना,
क्लेद, मल का नाश करता है। कृमियों को मारता है, मांस का लेखन करता
है (स्थूलता को कम करता है)। खाये हुए भोजन का रेचन करता है, खाज
को मिटाता है, व्रणों को बैठाता है, भरता है । जमे हुए रक्त को तोड़ता है,
सन्धि-बन्धनों को छेदन करता है, मार्गों को साफ़ बनाता है, कफ को शान्त
करता है । लघु, उष्ण और रूक्ष होता है ।
यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो कटु ।
१. 'भ्रममदवमथु' इति च पाठः ।