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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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बढ़ाता है, तेज देता है, मन को उत्तेजित ( जाग्रत ) करता है । इन्द्रियों को
बलवान् करता है, बल को बढ़ाता है वायु का अनुलोमन करता हैं, हृदय के
लिये हितकारी है । मुख में लार चुआता है, खाये हुए भोजन को बाहर निका-
लता है, क्लिन्न ( शरीर को गीला ) बनाता है । खाये भोजन को पचाता है,
प्रसन्नता करता है लघु, उष्ण, स्निग्ध गुण वाला है ।।
यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय, तो दांतों को खोट
करता है, ( खट्टा करता है ), तृप्ति अर्थात् भोजन में अनिच्छा उत्पन्न करता
है, आंखों को मीचाता है, शरीर के बालों को कंपा देता है, ( रोमांचित करता
है ), कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है,
मांस में जलन पैदा करता है, शरीर को ढीला ( सुस्त करता है ), क्षीण, उरः-
क्षत रोगी, निर्बल, कमजोर पुरुषों में सूजन उत्पन्न करता है और भी जख्म,
चोट, दांत लगे, जले, अस्थि आदिका टूटना, सूजन, सन्धिभ्रंश, प्राणियों के
मूत्रजन्य विष, स्पर्शजन्य विष ( मकड़ी के ), रगड़ लगे हुए, दो टुकड़े हुए,
चुभे हुए पिसे हुए आदि व्रणों को पका देता है । अग्निगुण होने से कण्ठ,
छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है ॥ (२) ॥
लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः
सरो विकाश्यधः संस्रंस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भ-बन्ध संघात-विधमनः
सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमास्त्रावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान्
विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहारमाहारयोगी,
नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च; स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः
पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयांत्, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति,
कुष्णाति मांसानि, प्रगाळयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति,
दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वली-पलित-
खालित्यमापादयति, अपि च लोहित-पित्ताम्ल-पित्त-वीसर्प-वात-रक्त-
विचर्चिकेन्द्रलुप्त-प्रभृतीन्वकारानुपजनयति ॥ ( ३ )॥
लवण रस—पाचक, नरम बनाने वाला, अग्निदीपक, नीचे गिराने वाला,
छेदन भेदन करने वाला, तीक्ष्ण, सर ( मल लाने वाला ), विकाशी ( क्लेद का
छेदन करने वाला ) अधःस्रंसी, विष्यन्दशील ( रेचक ) विरलता करने वाला
वातनाशक, मल-मूत्रादि के अवरोध को नाश करने वाला और जहां पर
जरा सा अधिक हो जाता है, वहां पर और कोई दूसरा रस स्पष्ट नहीं
में थूक उत्पन्न करता है, कफ को पिघलाता है, मागों का शोधन