चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context[अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३६
पित्त और कफ की विषमता है। इन दोनों (आगन्तुज और निज)
प्रकार के रोगों का मूल प्रेरक (प्रवृत्ति का) कारण असात्म्येन्द्रियार्थ-संयोग,
प्रज्ञापराध और परिणाम है। ये चारों प्रकार के रोग बढ़कर परस्पर एक दूसरे
में मिल जाते हैं। परन्तु तो भी सन्देह को उत्पन्न नहीं करते। परस्पर मिलने
पर भी लक्षण पृथक् पृथक् दीख पड़ते हैं। आगन्तुज रोग प्रथम शरीर के अन्दर
पीड़ा को उत्पन्न करता है और पीछे से वात, पित्त और कफ की विषमता को
उत्पन्न करता है। निज रोग प्रथम वात, पित्त, कफ की विषमता को उत्पन्न
करते हैं और फिर पीछे से पीड़ा को उत्पन्न करते हैं। तीनों ही दोषों का शरीर
में स्थान विभाग कहते हैं—यथा—बस्ति (मूत्राशय), पुरीषाधान (पक्वाशय),
कटि (कमर), सक्थिएं (जंघायें) और पांव की अस्थियां ये वायु के १स्थान
हैं। इनमें भी पक्वाशय विशेष करके वायु का स्थान है। पसीना, रस,
लसीका, रुधिर और आमाशय (का निचला भाग) ये पित्त के स्थान हैं।
इनमें भी आमाशय मुख्य करके पित्त का स्थान है। छाती, शिर, ग्रीवा, व
सन्धियां, आमाशय का (ऊपर का भाग) और मेद, ये कफ के स्थान हैं।
इनमें भी छाती विशेष करके कफ का स्थान है२। ये वात, पित्त, कफ तीनों
दोष सम्पूर्ण शरीर में गति करते हैं, और गति करते हुए कुपित या अकुपित
अवस्था में रहकर सम्पूर्ण शरीर में शुभ या अशुभ लक्षणों को उत्पन्न करते हैं।
यथा—प्रकृतिभूत स्वस्थरूप में रहकर शुभ लक्षणों को, यथा—उपचय (शरीर
की पुष्टि), बल-कान्ति की वृद्धि, वर्ण (कान्ति) की उज्ज्वलता और विकृत
(कुपित रूप) अशुभ लक्षणों (रोगों) को उत्पन्न करते हैं। विकार (रोग)
दो प्रकार के हैं—सामान्य और नानात्मज। सामान्य—वातादि दोष प्रत्येक
मिलकर जो रोग उत्पन्न करते हैं। नानात्मज—जब वातादि दोष परस्पर न
मिल कर स्वतन्त्ररूप से रोग उत्पन्न करते हैं। इनमें सामान्यज रोग पहिले
‘अष्टोदरीय’ अध्याय में कह दिये हैं और नानात्मज रोगों का इस अध्याय में
वर्णन करेंगे। यथा—अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्तरोग और
बीस प्रकार के कफ रोग हैं ॥ ३-१० ॥
तत्राऽऽदौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्च,
विपादिका च, पादशूलं च, पादभ्रंशश्च, पादसुप्तता च, वातखुड्डता च,
१ प्राण अपान भेद से वायु के स्थान अन्यत्र कहेंगे। यहां पर बताये हुए
स्थानों में इन दोषों के विकार प्रायः करके होते हैं, अतः इनकी गणना की है।
२ आमाशय के ऊर्ध्वभाग में पित्त और अधोभाग में कफ का स्थान है।