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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 884 of 978

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Page 884
८८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
दृश्यमानस्य तन्निमित्तस्य च देहस्यानात्मत्वं सिद्धम्, उदशरावादौ छायाकरत्वाद्देहसम्बद्धालङ्कारादिवत् ।इस प्रकार जलके शकोरे आदिमें दीखनेवाले उनके निमित्तभूत देहका भी अनात्मत्व सिद्ध होता है, क्योंकि देहसम्बन्धी अलंकारादिके समान उसका भी जलके शकोरे आदिमें छायाकरत्व है।
न केवलमेतावदेतेन यावत्किञ्चिदात्मीयत्वाभिमतं सुखदुःखरागद्वेषमोहादि च कादाचित्कत्वान्नखलोमादिवदनात्मेति प्रत्ये- तव्यम् । एवमशेषमिथ्याग्रहापन- यनिमित्ते साध्वलङ्कारादिदृष्टान्ते प्रजापतिनोक्ते श्रुत्वा तथा कृत- वतोरपिच्छायात्मविपरीतग्रहो नापजगाम यस्मात्तस्मात्स्व- दोषेणैव केनचित्प्रतिबद्धविवेक- विज्ञानाविन्द्रविरोचनावभूतामिति गम्यते । तौ पूर्ववदेव दृढनिश्चयौ पप्रच्छ किं पश्यथ इति ॥ २ ॥इसीसे केवल इतनी ही बात सिद्ध होती हो सो नहीं, बल्कि सुख, दुःख, राग, द्वेष और मोहादि जितना कुछ भी आत्मीयरूपसे माना जाता है वह भी नख एवं लोमादिके समान कभी-कभी होनेवाला होनेके कारण अनात्मा ही है—ऐसा जानना चाहिये । इस प्रकार सम्पूर्ण मिथ्या ग्रहणकी निवृत्तिका हेतुभूत प्रजापतिका कहा हुआ साधु अलं- कारादिका दृष्टान्त सुनकर वैसा ही करनेपर भी, क्योंकि उनका छायात्मसम्बन्धी विपरीत ज्ञान निवृत्त नहीं हुआ इसलिये यह विदित होता है कि उन इन्द्र और विरोचनका विवेकविज्ञान उनके किसी अपने दोषसे ही प्रतिबद्ध हो गया था । तब प्रजापतिने पहलेहीके समान दृढ़ निश्चयवाले उन दोनोंसे पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' ॥२॥