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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 883 of 978

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Page 883

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ईवस्त्रपरिधानौ परिष्कृतौ छिन्नलोमनखौ च भूत्वोदशरावे पुनरीक्षेथामिति । इह च नादिदेश यदज्ञातं तन्मे प्रब्रूतमिति । कथं पुनरनेन साध्वलङ्कारादि कृत्वोदशरावेऽवेक्षणेन तयोश्छायात्मग्रहोऽपनीतः स्यात् । <br><br> साध्वलङ्कारसुवसनादीनामागन्तुकानां छायाकरत्वमुदशरावे यथा शरीरसम्बद्धानामेवं शरीरस्यापिच्छायाकरत्वं पूर्वं बभूवेति गम्यते । शरीरैकदेशानां च लोमनखादीनां नित्यत्वेनाभिप्रेतानामखण्डितानां छायाकरत्वं पूर्वमासीत् । छिन्नेषु च तेषु नैव लोमनखादिच्छाया दृश्यतेऽतो लोमनखादिवच्छरीरस्याप्यागमापायित्वं सिद्धमित्युदशरावादौरहते हो उसी भाँति अच्छी तरह अलंकृत होकर 'सुवसन'—महामूल्य वस्त्र धारणकर तथा परिष्कृत यानी लोम और नख काटकर जलके शकोरेमें फिर देखो ।' यहाँ प्रजापतिने ऐसा आदेश नहीं किया कि उस समय तुम जो न जान सको वह मुझे बतलाना । [ क्योंकि वे यही चाहते थे कि ] इस प्रकार सुन्दर अलंकारादि धारण कर जलके शकोरेमें देखनेसे किसी-न किसी तरह उनकी छायात्मबुद्धि निवृत्त हो जाय । <br><br> जिस प्रकार देहसे सम्बद्ध सुन्दर अलंकार और बहुमूल्य वस्त्रादि आगन्तुक पदार्थ जलके शकोरेमें अपनी छाया प्रकट करते हैं उसी प्रकार पहले शरीर भी छायाकारक था—ऐसा इससे ज्ञात होता है । शरीरके एकदेशरूप तथा नित्यरूपसे माने गये अखण्डित लोम और नखादि भी पहले छायाजनक थे । किंतु अब उन्हें काट लिये जानेपर उन लोम एवं नखादिकी छाया दिखायी नहीं देती । इससे लोम और नखादिके समान शरीर भी आगमापायी ( उत्पन्न और नष्ट होनेवाला ) सिद्ध होता है ।