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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 830 of 978

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Page 830

तृतीय खण्ड

असत्यसे आवृत सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना

यथोक्तात्मध्यानसाधनानुष्ठानं प्रति साधकानामत्साहजननाथमनुक्रोशन्त्याह—कष्टमिदं खलु वर्तते यत्स्वात्मस्थाः शक्यप्राप्या अपि—उपर्युक्त आत्मध्यानरूप साधनके अनुष्ठानकें प्रति साधकोंमें उत्साह पैदा करनेके लिये दया करनेवाली श्रुति कहती है—यह बड़े ही कष्टकी बात है कि अपने आत्मामें ही स्थित और प्राप्त होने योग्य भी—

त इम सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषाꣳ सत्यानाꣳसतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥

वे ये सत्यकाम अनृताच्छादनयुक्त हैं। सत्य होनेपर भी अनृत (मिथ्या) उनका अपिधान (आच्छादन करनेवाला) है, क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता है वह-वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता ॥ १ ॥

त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषामात्मस्थानां स्वाश्रयाणामेव सतामनृतं बाह्यविषयेषु स्त्र्यन्नभोजनाच्छादनादिषु तृष्णा तन्निमित्तं च स्वेच्छाप्रचारत्वं मिथ्याज्ञाननिमित्तत्त्वादनृतमित्यु-वे ये सत्यकाम अनृतापिधान (मिथ्यारूप आच्छादनवाले) हैं। अपने ही आश्रित रहनेवाली उन आत्मस्थित कामनाओंका अनृत [अपिधान है]—स्त्री, अन्न भोजन और वस्त्रादि बाह्य विषयोंमें जो तृष्णा है उसके कारणहोनेवाला स्वेच्छाचार मिथ्याज्ञानजनित होनेके कारण 'अनृत' कहा जाता है; उनके