छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 829 of 978
Read in contextखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२५
| यं यमन्तं प्रदेशमभिकामो भवति । यं च कामं कामयते यथोक्तव्यतिरेकेणापि सोऽस्यान्तः प्राप्तुमिष्टः कामश्च संकल्पादेव समुत्तिष्ठत्यस्य । तेनेच्छाविघाततयाभिप्रेतार्थप्राप्त्या च सम्पन्नो महीयत इत्युक्तार्थम् ॥ १० ॥ | वह जिस-जिस अन्त यानी प्रदेशकी कामना करनेवाला होता है और उपर्युक्त भोगोंसे भिन्न जिस भोगकी इच्छा करता है वह इसका पानेके लिये अभिमत प्रदेश और भोग इसे संकल्पमात्रसे प्राप्त हो जाता है। उससे अर्थात् इच्छाके अविघात और अभिमत पदार्थकी प्राप्तिसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है—इस प्रकार यह अर्थ पहले कहा ही जा चुका है ॥ १० ॥ |
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इति च्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये द्वितीयखण्ड
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥