छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 809 of 978
Read in contextPage 809
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यथ ८०५
| बुद्धीनामसदिव प्रतिभाति । सन्मार्गस्थास्तावद्भवन्तु; ततः शनैः परमार्थसदपि ग्राहयिष्यामीति मन्यते श्रुतिः । | अद्वितीय ब्रह्म है, वह मन्दबुद्धि पुरुषोंको असत्के समान प्रतीत होता है; ये सन्मार्गमें स्थित हों, तब धीरे-धीरे मैं इन्हें परमार्थ सत्को भी ग्रहण करा दूँगी--ऐसा श्रुति मानती है। |
|---|
हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥
अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ १ ॥
| अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं दहरमल्पं पुण्डरीकं पुण्डरीकसदृशं वेश्मेव वेश्म द्वारपालादिमत्त्वात्; अस्मिन्ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः परस्य पुरं राज्ञोऽनेकप्रकृतिमद्यथा पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धिभिः स्वाम्यर्थकारिभिर्युक्तमिति ब्रह्मपुरम् । पुरे च वेश्म राज्ञो यथा तथा तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे दहरं वेश्म ब्रह्मण उपलब्ध्यधि- | अथ-इसके पश्चात् [ यह कहा जाता है कि ] यह जो आगे कहा जानेवाला दहर अर्थात् छोटा-सा कमल सदृश गृह है-द्वारपालादिसे युक्त होनेके कारण जो गृहके समान गृह है वह इस ब्रह्मपुरमें-ब्रह्म यानी परमात्माके पुरमें, जैसा कि राजाका अनेकों प्रजाओंसे युक्त पुर होता है उसी प्रकार यह ( शरीर ) भी [आत्मारूप] अपने स्वामीका अर्थ सिद्ध करनेवाली अनेकों इन्द्रियों तथा मन और बुद्धिसे युक्त पुर है, अतः यह ब्रह्मपुर है। जिस प्रकार पुरमें राजाका भवन होता है उसी प्रकार उस ब्रह्मपुररूप शरीरमें एक सूक्ष्म गृह अर्थात् ब्रह्मकी उपलब्धिका अधिष्ठान है, जिस प्रकार कि शाल- |
|---|