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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 808 of 978

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Page 808
८०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
संस्कृतहिन्दी
त्सत्यकामादिगुणवत्त्वं च वक्तव्यम् । तथा यद्यपि ब्रह्मविदां स्त्र्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोपरमो भवति तथाप्यनेकजन्मविषयसेवाभ्यासजनिता विषयविषया तृष्णा न सहसा निवर्तयितुं शक्यत इति ब्रह्मचर्यादिसाधनविशेषो विधातव्यः । तथा यद्यप्यात्मैकत्वविदां गन्तृगमनगन्तव्याभावादविद्यादिशेषस्थिति-निमित्तक्षये गगन इव विद्युदुद्भूत इव वायुरुद्धेन्धन इवाग्निः स्वात्मन्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तृगमनादिवासितबुद्धीनां हृदयदेशगुणविशिष्टब्रह्मोपासकानां मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येत्यष्टमः प्रपाठक आरभ्यते ।होनेका प्रतिपादन करना आवश्यक है । इसी प्रकार यद्यपि ब्रह्मोपासकोंको स्त्री आदि विषयोंसे स्वयं ही उपरति होती है तो भी अनेक जन्मोंके विषयसेवनके अभ्याससे उत्पन्न हुई विषयसम्बन्धिनी तृष्णा सहसा निवृत्त नहीं की जा सकती, इसलिये ब्रह्मचर्यादि साधनविशेषका विधान करना भी आवश्यक है, इसी तरह यद्यपि आत्माका एकत्व जाननेवालोंकी दृष्टिमें गमन करनेवाले, गमनक्रिया और गन्तव्य देशका अभाव हो जानेके कारण शरीरकी स्थितिकी निमित्तभूत अविद्या आदिका क्षय हो जानेपर उनकी विद्युत, बढ़े हुए वायु और जिसका ईंधन जल गया है उस अग्निके आकाशमें लीन हो जानेके समान अपने आत्मामें ही निवृत्ति हो जाती है तो भी जिनकी बुद्धि गन्ता और गमनादिकी वासनासे युक्त है अपने हृदयदेशस्थित गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले उन पुरुषोंकी शिरोगत नाडीसे होनेवाली गतिका प्रतिपादन करना आवश्यक है, इसीलिये अष्टम प्रपाठकका आरम्भ किया जाता है ।
दिग्देशगुणगतिफलभेदशून्यं हि परमार्थसदद्वयं ब्रह्म मन्द-दिशा, देश, गुण, गति और फलभेदसे शून्य जो परमार्थ सत्