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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 804 of 978

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Page 804
८००छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ७

उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं॥ २ ॥

| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति—न पश्यः पश्यतीति। पश्यो यथोक्तदर्शी विद्वानित्यर्थः, मृत्युं मरणं रोगं ज्वरादि दुःखतां दुःखभावं चापि न पश्यति। सर्वं ह सर्वमेव स पश्यः पश्यत्यात्मानमेव सर्वम्। ततः सर्वमाप्नोति सर्वशः सर्वप्रकारैरिति। <br><br> किञ्च स विद्वान्प्राक्सृष्टिप्रभेदादेकधैव च संस्त्रिधादिभेदैरनन्तभेदप्रकारो भवति सृष्टिकाले। पुनः संहारकाले मूलमेव स्वं पारमार्थिकमेकधाभावं प्रतिपद्यते स्वतन्त्र एवेति विद्याफलेन प्ररोचयन्स्तौति। <br><br> अथेदानीं यथोक्ताया विद्यायाः सम्यगवभासकारणं मुखावभासकारणस्तेवादर्शस्य विशुद्धिकारणं | इस विषयमें यह श्लोक—मन्त्र भी है। पश्य नहीं देखता। पश्य अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे देखनेवाला विद्वान् मृत्यु—मरण, ज्वरादि रोग और दुःखत्व यानी दुःखभावको नहीं देखता। वह पश्य—विद्वान् सभीको देखता है अर्थात् सबको आत्मरूप ही देखता है। इसीसे वह सबको सब प्रकार प्राप्त होता है। <br><br> तथा वह विद्वान् सृष्टिभेदके पूर्व एकरूप होता हुआ ही सृष्टिकालमें त्रिधा आदि अनन्तभेद प्रकारोंवाला हो जाता है। और फिर संहारकालमें अपने मूल पारमार्थिक एकधाभावको ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह स्वतन्त्र ही है—इस प्रकार विद्याके फलद्वारा रुचि उत्पन्न करते हुए सनत्कुमारजी उसकी स्तुति करते हैं। <br><br> इसके पश्चात् अब मुखावभासकी हेतुभूत दर्पणकी विशुद्धि करनेके समान उपर्युक्त विद्याके सम्यक् प्रकारसे प्रतिफलित होनेके हेतुभूत साधनका उपदेश किया |