छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 271 of 978
Read in context| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २६७ |
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| वारितादित्यरश्मीनां सवितोर्ध्व इवोदेतावागस्तमेता दृश्यते । पर्वतोर्ध्वच्छिद्रप्रवेशात्सवितृप्रकाशस्य । | सब ओरसे पर्वतरूप परकोटेद्वारा रोक लिये जानेके कारण इलावृतखण्डमें रहनेवालोंको वह मानो ऊपरकी ओर उदित होता और नीचेकी ओर अस्त होता दिखायी देता है, क्योंकि वहाँ सूर्यका प्रकाश पर्वतोंके ऊपरी छिद्रद्वारा ही प्रवेश करता है । |
| तथर्गाद्यमृतोपजीविनाममृतानां च द्विगुणोत्तरोत्तरवीर्यवत्त्वमनुमीयते भोगकालद्वैगुण्यलिङ्गेन । उद्यमनसंवेशनादि देवानां रुद्रादीनां विदुषश्च समानम् ॥ १-४ ॥ | इस प्रकार ऋगादि अमृतके आश्रित जीवन व्यतीत करनेवाले देवताओंके पराक्रमकी उत्तरोत्तर द्विगुणताका उनके भोगकालके द्विगुणत्वरूप लिङ्गसे अनुमान किया जाता है । रुद्रादि देवताओं और विद्वानोंके उद्यमन और संवेशन समान ही हैं ॥ १-४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥